Lekh by Dr. Arvind Jain

पुनः मूषको भव-

एक किवदन्ति सुनी थी की एक गरीब आदमी की इच्छा थी रईस बनने की ,उसने बहुत प्रयास किया पर सफलता नहीं .एक दिन वह निराश होकर आत्म हत्या करने  का सोचा ,उसके शहर में एक आत्म हत्या या ख़ुदकुशी करने का स्थान था .वहाँ बहुत आत्महत्याएं होने के कारण सरकार ने वहां पर एक चार की गार्ड लगा दी थी. वह बेचारा गरीब आत्म हत्या का साहस लेकर चोरी छिपे जा रहा था तो इतने में एक सिपाही ने देखा तो चिल्लाकर बोला रुक जाओ नहीं तो गोली मार देंगे !

ऐसा ही हमारी लोककल्याणकारी सरकार की संस्था स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया ने एक आदेश  जारी कर खाते में कम से कम राशि न रखने पर जुरमाना ,ए.टी ,एम् सहित अन्य सेवायों में चार्ज लगाएंगी . इसके पहले तीन बैंक भी इसी प्रकार की घोषणा कर चुके है .देश में नोट बंदी के पहले 90 % लेन देन नगद होते थे और 10 % डिजिटल . इससे सरकार की मंशा यह हैं की इस वर्ष बैंक डिजिटल मनी से 26000 करोड़ रुपये वसूलेंगी . इसका मतलब तुम मरने जाएंगे तो चाहे आत्म हत्या करो या  गार्ड की गोली खाओ . !

यह कैसी बिडम्बना हैं हमारा पैसा हमारा नहीं रहा .वैसे भी धन ,शरीर ,मकान ,दौलत पराया हैं तो पराया ही रहेंगे. वैसे मोदी जी भारतीय दर्शन के प्रकांड विद्यवान तो हैं और उन्होंने राज्य धर्म के वास्ते अपनी पत्नी तक को छोड़ दिया या त्याग दिया या और  कोई  कारण जैसे गरीबी .चाय बेचने वाले की उस समय हैसियत नहीं रही होंगी या कोई व्याधि के कारण या ना पसंद  होने के कारण जो भी हो व्यक्तिगत लफड़े में नहीं पड़ना . ! इस पीड़ा से व्यथित होकर उन्होंने सोचा ,अनुभव किया की जब बच्चा पैदा होता हैं तो उस समय जो कपडे पहनाये जाते हैं उनमे जेब नहीं होता और मरते समय कफ़न में भी जेब नहीं होता . तो हमारे देशवासी  भारतीय दर्शन को अंगीकार करे .धन कमाना कष्टकारी होता हैं ,उसकी सुरक्षा भी कठिन और उसका खर्च करने में दुःख होता हैं और संचित कर लिया तो अगली पीढ़ी खाएंगी .संबधित क्या खाएंगे?कारण जो कमाता है उसे अधिक पीड़ा होती हैं खर्च करने में . तो मोदी जी ने भारतीय दर्शन का चार्वाक सिद्धान्त  को भी अपनाया  और अपरिग्रहवाद को अपना जीवन दर्शन banaya . आप कमाए ,खूब कमाए ,कमाते समय अप्रतक्ष्य में छुपा कर (hidden  tax ) लगता हैं जिसका आभास हमें नहीं होता जैसे हमें हवा का दबाव का अहसास नहीं होता उसी प्रकार आप कितना श्रम  कर ,कितना कर चुकाकर जो पैसा कमाते हैं उसे आप मनमाने ढंग से खर्च नहीं कर सकते. कारण वो रूपए आपके नहीं हैं वो सरकार के हैं ,आप मात्र कमा कर चौकीदारी करे .घर में रखना खतरनाक होता हैं .कब चोर ले जाते ,कब जान पर बन जाए इसीलिए आप सब पैसा हमारे पास रखो .हमारी देखरेख में खर्च करो .आप धन के प्रति निर्लिप्त  भाव रखो ,अकिञ्चय भाव रखो जैसे कीचड में कमल खिलता हैं वैसे आप कीचड में खिलो और उससे अलिप्त रहो.

आजकल व्यापारी बहुत शांति के साथ जीवन यापन कर रहे हैं .बाजार में रौनक नहीं हैं . ना ही कोई बाजार में उठाव हैं .है इससे एक बात समझ में आयी की आप जब चाहे तब जहाँ गए और ए टी एम् से पैसा निकाला उससे बचने के लिए आपको बार बार बैंक या ए  टी एम् जाने की जरुरत नहीं.जाओ एक बार दो बार में अपने खर्च के मुताबिक पैसा अपने पास रखो और प्लास्टिक के रुपये का भी मर्यादित उपयोग करो. इससे आप अपना समय यहाँ वहां लाइन में कम लगे,समय की इज़्ज़त करो और अपने पैसों के प्रति मोह ज्यादा मत रखो .

यह प्रयोग बहुत दूरदर्शिता का हैं ,अभी तो अपना माल पराया भी हो जायेगा  या पराया माल अपना. कारण हम सब नम्बरी होते जा रहे हैं ,हमारी पहचान नम्बरों से होना हैं .आधार कार्ड नंबर,मोबाइल नंबर, मकान नंबर, खता नंबर. सीट नंबर .तो हम नम्बरी हो गए और इतने सब काम कम होने के बाद भी समय की कमी होने से हम कमवक़्त होते जा  रहे हैं या हैं .

वैसे अब समय पहले जैसा नहीं हैं जैसे हमारे पूर्वज करते थे ,मर जाते थे पर उपयोग नहीं नहीं करते थे अपने धन का .अब तो कमाओ और खाओ ,पियो और मौज़ करो ,ना लेकर आये थे और ना लेकर जाना हैं तो किस बात की चिंता. सरकार के नोट सरकार के पास उनकी सुरक्षा में .यहाँ तक तो ठीक था पर ऊपर से जुरमाना लगाना यह थोड़ा समझ में नहीं आ रहा .दूसरा हम अपढ़ ,नंबरों का अंतर और धन दूसरे के पास फिर कैसे मिलेंगे.? हम अपनी पत्नी ,भाई को पैसा देते हैं तो वो मुश्किल से मिलता ,तब अनजान के पास से कैसे मिलेंगे. सरकार कहती हैं बार बार चक्कर मत लगाओ ,तब तो लगाना पड़ेंगे. और समय पर नहीं मिले तो खटिया खड़ी .

हमतो यह कहते हैं थोड़ा हम लोगों के साथ मुरव्वत करे तो अच्छा .सरकार काटें ना पर फुस्कारते रहे .हम तो अब इतने डरे है की अब धन का मोह नहीं रहा पर हम जनसँख्या तो बढ़ा सकते हैं  न . जनसँख्या बढ़ाने में तो कहीं नहीं जाना पड़ेगा. इसीलिए हम तो अधर में लटके हैं . जो ज्ञान बड़े बड़े संत ,महंत नहीं दे पाए वो नोट बंदी के ऐसा तत्व ज्ञान दे दिया की यह संसार वास्तव   में क्षण भंगुर लगने लगा.राजनीती से हम आध्यत्म जल्दी सीख सकते हैं !चलो लौट के बुध्धु घर को आये.

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