#Lekh by Kirti Gandhi

राजस्थान में  लोकपर्वके रुप  में गणगौर बड़ी धूमधाम से मनाया  जाता है ।यू तो गणगौर स्त्रियों का त्यौहार है किंतु कमोबेश पूरा परिवार ही इसमें शामिल रहता है। इसमें भगवान शंकर और पार्वती की पूजा ईश्वर और गणगौर के रुप में की जाती है ।होलिका दहन के दूसरे दिन होली की राख एवं मिट्टी मिलाकर 16 पिंडिया बनाई जाती है ।जिन्हें ईश्वर गणगौर मानकर इनकी पूजा की जाती है ।

       मान्यता है कि सोलह दिन गणगौर  की पूजा करने से कुंवारी कन्याओं को मनचाहा वर एवं सुहागिन स्त्रियों को अखंड सुहाग की प्राप्ति होती है  इसी संदर्भ में लड़कियां गीत भी गाती हैं —
            जो तू पूजेगी हँसती गाती तो
             हँसतो गातो वर आवसी जी राज ….
इन 16 दिनों में नवविवाहिता एवं कन्याएं सुबह बगीचे से दुर्बा एवं फूल कलश पर सजा कर गणगौर पूजने जाती है ।शादी के बाद पहली गणगौर पूजने नवविवाहिता पीहर आती है और उसी घर में गणगौर पूजी जाती है ।आसपास की कुंवारी कन्याएं भी वही इकट्ठी हो जाती है ।
          गौर गणगौर माता खोल किवाड़ी
              बाहर भी थारी पूजन वाली ….
इस गीत के साथ पूजा प्रारंभ होती है और पूरे 16 दिन पूरा माहौल गीतमय  बना रहता है। गणगौर को बेटी -बहन के रुप में पूजा जाता है। रोज श्रृंगार के रूप में कुंकु, काजल, मेहंदी की 16-16 बिंदिया लगाई जाती है भोग लगाया जाता है आरती की जाती है तथा कथा भी कही जाती है। दोपहर में गणगौर को प्यास लगी होगी सोचकर गीत गाते हुए मीठा पानी पिलाया जाता है ।
          म्हारी गौर तिसाई जी राज घाट्यारी मुकुट करो
         म्हारी गौर ने ठंडे मीठे पानी पिलाए घाट्यारी मुकुट करो…
चैत्र कृष्ण सप्तमी को शीतला माता की पूजा के साथ मिट्टी भरे सिकोरे में जवारे बोए जाते हैं ।जिसमें  घर के पुरुष गेंहू डालते है एवं स्त्रियाँ  उसने पानी डालती है ।फिर जवारों के गीत गाए जाते हैं —
         म्हारा हरिया जवारा के नंबर देगा सरस विद्या
           किण जी बोया ए के किण बहू सींच लिया …
शाम को गणगौर का बिन्रादौरा निकाला जाता है अर्थात गणगौर को सजाकर आसपास के घरों में कन्याएं लेकर जाती हैं ।वहां गणगौर एवं कन्याओं की खूब आवभगत की जाती है एवम शगुन के रूप में  भेट दी जाती है और महिलाएं खुश होकर गीत गाती हैं —
       म्हारे बाबाजी रे मंडी गणगौर ओ रसिया
            घड़ी दो ए खेलबा ने जाबा दो ।
        थाने घड़ी दो ए जवता प्रहर दो ए आवता
           प्रहर दो ऐ साथिया में लागे ओ मिरगा नैनी
               था बिन घड़ी अ न आसिंगे ।…
माना जाता है कि चैत्र शुक्ल दूज को ईश्वर जी गौरा को लेने ससुराल आते हैं। वह दिन गणगौर का विशेष पूजन होता है। घर की सभी स्त्रियां व्रत रखती हैं। सोलह श्रृंगार करती हैं एवं धूमधाम से इसर -गौर की पूजा की जाती है शहर के मुख्य मार्गो से गौर की प्रतिमाओं की झांकी भी निकाली जाती है शाम को गौर को ससुराल वापस भेजने के प्रतीक के रूप में प्रतिमाओं और पिंडियों को जल में विसर्जित कर दिया जाता है राजस्थान में इन दिनों भव्य मेलों का भी आयोजन होता है ।
कीर्ति गाँधी
दुर्ग छ.ग.
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