#Lekh by kumar sandeep

आलेख – प्यार की परिभाषा

प्यार ज़रूरी नहीं सूरत देख कर हो। प्यार तो मन को देखकर होता है और जब हम किसी से दिल खोलकर अपनी हर बात का जिक्र करते है तो समझलो प्यार हो गया। जैसे बचपन में माँ से प्यार होता है बड़े होते है तो दोस्तों से और जब परिपक्व होते है तो अपनी पत्नी या पति से जो दोस्त से भी बढ़कर है। इन सब में प्यार है इन सब में प्यार करने का अंदाज़ अलग है लेकिन प्यार तो आखिर प्यार है और हमें प्यार का मूल्य पता करना ज़रूरी है नहीं तो कोई और इन्हें खरीद लेगा। क्योकि सच्ची मोहब्बत इंसान उसी से करता है जिससे वह दुनिया में सबसे ज्यादा उम्मीद रखता हो कुछ अच्छा करने कि, खुद को समझने की, बातो में बहने वाले भावो को स्थान देने की और जब वह उम्मीद ज़िन्दगी भर उनके साथ उनका हिस्सा बन जाती है तो वह विश्वास में बदल जाती है क्योकि जब आप किसी से हज़ार उम्मीदों को पूरा करने का प्रस्ताव उनके सामने रखते हो और वह प्रस्ताव पूर्ण हो जाता है तो वहाँ विश्वास का विकास बख़ूबी हो जाता है। और आप उन्हें अपनी पूरी ज़िन्दगी देने का दृढ़ संकल्प कर लेते है। इसी संकल्प से आपकी ज़िन्दगी में प्यार का स्थान स्थाई हो जाता है और ज़िन्दगी भर आप खुश रहते है
बस…….
यही है प्यार की परिभाषा
कभी ना छु सकेगी उसे निराशा
आभार
आपका प्यारा
लेखक – कुमार संदीप
जिला – जोधपुर
राजस्थान

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