#Lekh by Ramesh Raj

जनकवि रमेशराज
+क्षेत्रपाल शर्मा
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पेलग्रेव ने 1861 में जो ‘गोल्डन ट्रेजरी’ लिखी उसमें जानउन, शेक्सपीयर और बिहटमेन के कई ‘सानेट’ व गीत शामिल नहीं किए गए थे, मात्रा ‘लय’ आदि के कारण। लेकिन ठीक 100 साल बाद आस्कर विलियम्स के संपादकत्व में छपी ‘‘गोल्डन ट्रेजरी’’ में पेलगे्रव के संकीर्ण सिद्धान्त [माइनर पिंरसीपल्स] से  विपथ हो गए और ऐसी कविताएँ भी शामिल की गई जो ब्लेन्कवर्स या फ्रीन्वर्स में थीं।
मेरे उक्त लिखने का प्रयोजन ‘तेवरी’ से है। तेवरी को कुछ ग़ज़ल या ग़ज़ल-जैसी बता रहे हैं। इस संबंध में स्वयं तेवरीकार श्री रमेशराज जी ने कहा किः ‘‘तेवरीः आम आदमी की जिन्दगी में घुली तल्खियत का ब्यौरा है।’’ इस शीर्षक से कवि ने सविस्तार बताया है। जो तथ्य दिए हैं वे ग्राहय हैं और उनसे हर एक सहमत होगा।
वस्तुतः जब चीजें गुटबंदी में फंस जाती हैं, तो चाहे-अनचाहे भी बहुत बड़े अधर्म हो जाते हैं। इस विषय पर मैं ज्यादा नहीं बोलूँगा, प्रलेस, जलेस, दलित विमर्श, स्त्रीविमर्श | आलोचकों की तरफ से मैं ध्यान दिला रहा हूँ बटरोही नैनीताल, श्री वी.एन.राय या इलेन्दे की रचना ‘टाड्स माउथ’ का हिन्दी अनुवाद छाप देना। प्रतिभाशाली कवि या व्यक्तियों को किनारे करना शुभ नहीं है। वस्तुतः ह्यूमैनिटीज विषय पर जैसा काम ‘‘रूपकथा जर्नल’’ या  प्रोफेसर लिसा स्वानस्ट्रोम ने किया वैसा हिन्दी साहित्य में देखने को [ सोच और विचार दोंनों ही दृष्टियों से ] मिल नहीं रहा है। मैं तो सिर्फ झकझोर ही सकता हूँ। डिजीटल और इलेक्ट्रानिक युग में पहुंचे [ मैं फेसबुक, ट्विटर की बात नहीं कर रहा ] पिछड़ापन कब तक?
दो वर्ष पूर्व मैं स्थानीय इन्टर कालेज [ के.पी. इन्टर का. अलीगढ़ ] में श्री नीरजजी के जन्म समारोह में गया था। लौटते वक्त कुछ समय श्री रमेशराजजी के पास उस दिन बिताया।
मैंने उस दिन नीरजजी के ‘नास्तिक’ होने की बात बताई, इस पर जन-कवि श्री रमेशराज जी ने कहा कि’’ वे [ नीरज जी ] अपनी रचना में मानवता के प्रति अति-संवेदनशील हैं, वे नास्तिक नहीं हैं। आस्तिक किसे माना जाए? जो अपनों से दगा करता हो गला काटता हो?’’ बात भी उनकी सही थी।
मैं 34 वर्ष अलीगढ़ से बाहर रहा हूं। रमेशराजजी से सन् 2010 में ही परिचय के बाद, ज्ञात हुआ, मेरे पड़ोसी गांव के हैं। सुसंस्कार, मिलनसार और कवि-हृदय। बचपन में, मैंने एक-दो फूलडोल भी देखे हैं। श्री रमेशराज जी के पिता श्री रामचरन गुप्तजी की फूलडोलों में धाक थी। श्री खेम सिंह नागर जैसे जनकवियों के साथ, फूलडोलों में सम्मिलित होना ही नहीं, बल्कि निर्णायक भूमिका में रहना बहुत महत्वपूर्ण होता है।
सोना सोना होता है, चमक हो यह बहुत जरूरी नहीं हैं। आज गुटबंदी और अनंत-जी-हुजुरी के माहौल में कोई व्यक्ति कवि बनकर निर्वाह कर ले, इससे बड़ा कष्टप्रद माहौल हो नहीं सकता। अब फूल-डोल बंद से ही हैं जो श्रुति-स्मृति की परंपरा और ‘हिन्दी रेनाइसां’’ का या स्पष्ट शब्दों में कहूं तो ‘जन कवियों’ जैसे खेमसिंह नागरजी, रामचरन गुप्तजी के दिनों वाला समय बीत चुका।
मैं ऐसे पाठकों का प्रशंसक हूं जो समय से पूर्व ही ‘पक’ [ अनुभव से ] जाते हैं, बुद्धिमान हैं। सच तो यह है कि आप ‘अंदर’ की बात तो अंदर पहुंचकर ही जान पाते हैं।
साधारणतया सरकार में पद बहुत अहम होता है। पदों की कई श्रेणियां हैं। कई तो ‘कर्नल’ और ब्रिगेडियर’ का फर्क नहीं समझ पाते। कई ‘स्व-नियंत्रित’ के  मातहत अधिकारी का फर्क नहीं समझ पाते। जैसे ‘उच्च न्यायालय’ का मुख्य न्यायाधीश एवं सर्वोच्च न्यायालय का न्याधीश। समान- जैसे-लगने वाले पदों में भारी असमानताएं हैं। काम के हिसाब से यह पद्दति प्राकृतिक एवं सही है। जन-साधारण में भी यह साक्षरता बढ़े, ताकि आपसी सद्भाव एवं आदर परस्पर युक्तियुक्त हो। यही स्थिति मैं कवियों के बीच देखना चाहता हूं।
व्यक्ति अपनी विधा में ‘जीनियस’ हो सकता है, लेकिन कई अन्य क्षेत्रों में, देखा जाता है कि वह कमजोर प्रदर्शन करता है। प्राकृतिक नियम से संगत जो मानव-निर्मित नियम होंगे, वही तार्किक होंगे। जैसे फौजी व पुलिसवालों से बस्ती में आंख-की-सीध में चलने एवं जनता से नम्र व्यवहार, सचाई, ईमानदारी के निर्देश हैं, फिर भी कोई इस कर्तव्य को न समझे तो उसकी अपनी मंशा है। वह ऐसा कर क्यों रहा है, परिस्थिति-वश या प्रवृत्तिवश? प्रवृत्तिवश ही पाप है अपराध है।
अब, मूल विषय पर ही लौट आता हूं। तेवरी एक विधा है, वह भी स्वतंत्र। अब इसमें रचनाएं उपलब्ध है। यह न दोहा है, और न ही ग़ज़ल। कुछ तेवरियों का रसस्वादन भी करना ठीक रहेगा-
ऊधौजी जिसे भी मित्र कहते हैं आज हम
चले है कुटिल चाल, जै कन्हैयालाल की। नीति है कमाल की ||
सेब संतरे का जूस आज है कसैली चीज,
कोक ने कि कमाल जै कन्हैयालाल की। नीति है कमाल की ||
तेवरी विरोध-भरी वर्णिक छंद में
आज तेवरों में ज्वाल, जै कन्हैयालाल की। नीति है कमाल की ||
जन-कवि रमेशराजजी ने सपरी और अन्य लोकप्रिय प्रचलित विधा को अपनाकर लांगुरिया से ‘दे लंका में आग’-
मुझमें- मुझुमें बस इतना ही अंतर है
मैं माचिस बारूद बना तू लांगुरिया। गाल छर असुरों के ||
आज कंस का मित्र बना मुरलीधर है,
इस रिश्ते से खुश है क्या तू लांगुरियां। गाल छर असुरों के ||
जो रचना शाश्वत मानवीय मूल्यों को प्रतिष्ठापित करती है वही कालजयी होती है। इन तेवरियों में इन्हीं बातों को मुखरित किया गया है।
मुझे इनमें किसी रंग-हरा नीला आदि इत्यादि किसी का प्रभाव नहीं लगा।

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