#Lekh by sanjay verma ‘drushti’

कंडों का होलीदहन: पर्यावरण की पक्ष में

कंडे की होली जलाएं ,लाखों गायों का सालभर का खर्च निकल जाएगा । ये कार्य  पर्यावरण के हक़ में एवं  गो सेवा के लिए  पुनीत कार्य होगा ।आज भी कई क्षेत्रों में दाहसंस्कार में कंडों का ही पूर्ण रूप से उपयोग किया जाता है। जो की पर्यावरण व ,लकड़ी के हित  में है  ।  वर्तमान में  मोहल्लों में कई स्थानों पर होलीदहन  किया जाने लगा है ।सुझाव है की यदि एक ही स्थान पर किया जाए  तो पर्यावरण  के पक्ष में ज्यादा उपयोगी होगा । प्रकृति के मिजाज को गोर करें तो   ऋतुराज वसंत के आगमन पर वृक्षों की पत्तियां  अभिवादन के लिए जमीन पर बिछ जाती है ।  टेसू के फूल खिलने लगते है |आमों के वृक्ष पर आए मोर (आम के फूल ) ऐसे लगते मानों जैसे आम वृक्ष ने  सेहरा बांध रखा हो ,नव कोपले के जन्म पर कोयल  स्वागत गीत गा  रही हो । ऋतुराज वसंत गुलाबी ठंड प्रकृति में नया रस घोलती है ।इसमें वृक्ष की भूमिका सर्वोच्य होती है । वृक्ष वसंत के सूचक और हमारे जीवन में सदैव  उपयोगी,व पूजनीय रहे है । सूखे पहाड़ो पर बिना पत्ती के वृक्ष अपनी वेदना किसे बताये। जब  बारिश होगी तभी इन वृक्षों पर हरियाली अपना डेरा जमा सकेगी । बस इन्हें इन्सान काटे ना |क्योकि होली के लिए चोरी से ऐसे वृक्षों को बेजान समझकर ,बिना अनुमति के लोग काटने का प्रयत्न करने की फ़िराक मे रहते है |वृक्षों से ही  तो जंगल, पहाड़ो की सोंदर्यता है |वृक्ष ही इन्सान के मददगार एवं अंतिम पड़ाव तक का साथी होता  है साथ ही पशु,पक्षियों को आसरा प्रदान करता  है |अत: बिना पत्तियों के  वृक्षों को बेजान समझकर होली के लिए ना काटें|कंडे की होली  दहन हेतु संकल्प लेवे ताकि पर्यावरण  सुरक्षित रखा जा सके ।

वृक्ष की तटस्था
हे ईश्वर
मुझे अगले जन्म में
वृक्ष बनाना
ताकि लोगों को
ओषधियाँ ,फल -फूल
और जीने की प्राणवायु दे सकूँ ।
जब भी वृक्षों को देखता हूँ
मुझे जलन सी होने लगती है
क्योकि इंसानों में तो
अनेतिकता घुसपेठ कर गई है ।
इन्सान -इन्सान को
वहशी होकर काटने लगा है
वह वृक्षों पर भी स्वार्थ के
हाथ आजमाने लगा है ।
ईश्वर ने
तुम्हे पूजे जाने का आशीर्वाद दिया
बूढ़े होने पर तुम
इंसानों को चिताओ पर
गोदी में ले लेते हो
शायद ये तुम्हारा कर्तव्य है ।
इंसान चाहे जितने हरे
वृक्ष -परिवार उजाड़े
किंतु तुम सदेव इंसानों को कुछ
देते ही हो ।
ऐसा ही दानवीर
मै अगले जन्म में बनना चाहता हूँ
उब चूका हूँ
धूर्त इंसानों के बीच
स्वार्थी बहुरूपिये रूप से
लेकिन वृक्ष तुम तो आज भी तटस्थ हो
प्राणियों की सेवा करने में ।
संजय वर्मा “दृष्टि ”
9893070756

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