#Lekh by Chandra Kanta Siwal

बाल कामगारों की स्थिति चिंतनीय।

सरकार चाहे जितनी भी योजनाएं तैयार कर ले चाहे जितना भी जागरूकता अभियान चला ले लेकिन घरेलू कामगार बच्चों का भविष्य सुनहरा नहीं हो सकता उनकी स्थिति नहीं सुधर सकती है। वर्तमान में घरेलू कामगार बच्चों की स्थिति पुरी तरह शिक्षा से दूर होती जा रही है इनका सामाजिक स्तर भी उठने की बजाय गिरता ही जा रहा है। अपने बच्चों पर असीमित खर्चे करने वाले उन लोगों के पास इन बच्चों के प्रति कोई संवेदना नहीं है।

आज आधुनिक परिवार में पति पत्नी को खुद के बच्चे को संभालने के लिए समय नहीं है और खुद के बच्चे को संभालने के लिए दूसरे कामगार बच्चों को घर मे काम पर रख अपनी भौतिक सुख की दुनिया में खोते जा रहें हैं। उनके बच्चों को अच्छी देखरेख अच्छी परवाह बेहतर विद्यालय के साथ बेहतर समाज तो मिल जाता है पर उन कामगार बच्चों को क्या मिलता उन्हें तो श्रममूल्य भी ठीक से नहीं मिल पाता। घरों में काम करने वाले कामगार बच्चों की उम्र 10 से 20 के बीच अधिकांश होती है और यही उम्र है अपने विकास की दिशा तय करने की मनोवैज्ञानिकों ने भी माना है कि बच्चो को दिशा देने की सही उम्र 12 वर्ष तक ही होती है इस उम्र तक बच्चो को आप जिधर मोड़ना चाहे मोड़ा जा सकता है जो सिखाया जाएगा वही सिख पायेगा वह बच्चा ऐसी परिस्थिति में ऐसे कामगार बच्चों के बेहतर भविष्य की कामना कर सकते है? बिल्कुल नहीं। यही नहीं इन कामगार बच्चों के सुनहरे भविष्य का दरवाजा तो बंद ही दिखता है साथ ही दिखती है उत्पीड़न की व्यथा भी। ऐसी
उम्र के बच्चे शोषण के संदर्भ की जानकारी से अनभिज्ञ रहते हैं और मन कोमल व भयभीत रहता है जिस कारण वे शनै शनै प्रताड़ना के भी शिकार हो जाते हैं।
आगे चलकर इन कामगार बच्चों की सामाजिक स्थिति भी कारगर नही रह पाती और शिक्षा से वंचित रहकर ये बच्चे नौकर और कामगार मजदूर के रूप में ही ढल कर रह जाते हैं बच्चों में सर्वांगीण विकास के लिए ही सरकार द्वारा बाल श्रम प्रतिबंधित है पर क्या धरातल पर ये सत्य है कि बाल श्रम बंद है ? बाल श्रम बंद की बजाय बाल श्रम का श्रममूल्य भी नही मिलता बाल कामगारों को। बाल कामगारों स्थिति में सुधार लाने के लिए सभी लोगों को मानवीय तौर पर तैयार होना होगा सरकार की योजनाओं से काम नही चलेगा। अपने बच्चों की भांति इन कामगार बच्चों पर मानवीय पहलू के तहत ध्यान देना होगा तभी कुछ उम्मीद कर पाएंगे उनके विकास की। आज जिस गति से बाल अपराध, बाल कामगार पर अत्याचार,शोषण बढ़ता जा रहा है उससे तो नहीं लगता की सुधार हो पायेगा बाल कामगारों के जीवन में बाल कामगारों के हित में सरकार व समाज को अथक प्रयास की जरूरत है। सरकार को बाल श्रम कानून के तहत बनाये गए नियमों को तत्काल प्रभाव से संज्ञान में लेने की जरूरत है।

लेखिका चन्द्रकांता सिवाल चन्द्रेश
करौल बाग (दिल्ली)
9560660941

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