#Lekh by Dinesh Pratap Singh Chauhan

“वोटिंग जनता का प्रमुख कर्तव्य-आखिर क्यों ?”

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आजकल जब भी कहीं चुनाव होते हैं तो अखबारों ,टीवी पर सरकार ,सरकारी अधिकारी छोटे बड़े सभी नेता ,सेलिब्रिटी और खुद चुनाव आयोग की ओर से बयानबाज़ी शुरू हो जाती है कि जनता को अधिक से अधिक वोटिंग करना चाहिए। चाहिए तक तो ठीक यह भी बार बार बताया जाता है कि वोट देना लोकतंत्र में जनता का प्रमुख कर्तव्य और उत्तरदायित्व भी है।कुछ तो इससे भी आगे बढ़कर यह वक्तव्य भी देते हैं कि अगर वोटिंग में गिरावट आय तो वोटिंग को देश में अनिवार्य किया जाना चाहिए और वोटिंग न करनेवालों के लिए सजा का भी प्रावधान होना चाहिए।

इतना सब चलता रहता है परन्तु कोई भी व्यक्ति या संस्था,अख़बार और टीवी चैनल यह नहीं बताता कि वोटिंग जनता का प्रमुख उत्तरदायित्व तो है लेकिन वोटिंग के उत्तरदायित्व के निर्वहन के बाद उसके हाथ कुछ उसके हाथ कुछ अधिकार भी आते हैं या नहीं और यदि  उसके वह अधिकार  जो वोटिंग के बाद उसे स्वाभाविक रूप से मिलने ही चाहिए थे वे उसे नहीं मिल पाते हैं तो उसके लिए कोई अनिवार्यता का क़ानून भी बनाया जाना चाहिए और उन अधिकारों की अवहेलना  करनेवालों के लिए भी कोई दंड का प्रावधान होना चाहिए।

अब कल्पना करिये कि भारत में वोटिंग अनिवार्य कर दी गयी और उसके अनुपालन न करनेवालों के लिए सजा का प्रावधान भी कर दिया गया तो उसे लागू कौन कराएगा ?वही लॉर्ड मैकाले की पुलिस जिसके पास आज़ादी के 70 वर्षों बाद भी कोई शरीफ और भला पढ़ा लिखा नागरिक जाने से डरता है और गुंडे ,मवाली ,माफिया और टुच्चे छुटभैये नेता और दलाल रिश्तेदारों की  तरह बेख़ौफ़ आते जाते  रहते हैं।जहां  एक आदमी को आज भी रिपोर्ट लिखाने  के लिए एक दलाल और नेता की ज़रुरत पड़ती है या एसएसपी और आईजी तक पहुँच की या न्यायालय के आदेश की।

चलिए अब इस सब के बावजूद वोटिंग अनिवार्य कर ही दी गयी तो  वोट देने के बाद  जनता का अपने द्वारा  चुने अपने प्रतिनिधि पर  किसी तरह के नियंत्रण का भी कोई अधिकार उसके हाथ आएगा क्या  ?क्या वोटिंग के बाद उसके  द्वारा चुने गए प्रतिनिधि के   चिरकुट ,दलाल ,चापलूस उसे आसानी से अपने प्रतिनिधि से मिलने देगें ?क्या वोटिंग के समय प्रतिनिधि या उसकी पार्टी के किये वादों को  पूरा न करने पर वह उनके विरुद्ध विश्वासघात या धोखे की कोई रिपोर्ट या वाद दर्ज़ करा सकेगा?यदि ऐसा हो सके  तो क्यों न वोटिंग अनिवार्य करने के स्थान पर अपना विरोध या असंतोष व्यक्त करने का कानूनी  माध्यम और अधिकार

वोटिंग न करना बनाया जाय और सभी मीडिया ,अखबार ,टीवी इस बात को प्रमुखता से उल्लिखित  करें कि इन स्थानों के वोटरों या समूहों ने इन इन कारणों से विरोधस्वरूप  अपने वोटिंग  के अधिकारों का प्रयोग नहीं  किया और प्रशासन और सरकार का इस पर चुनाव आयोग को स्पष्टीकरण देना अनिवार्य हो।

यही नहीं नोटा में यह संशोधन भी किया जाना चाहिए यदि कहीं पर नोटा में सबसे अधिक प्रतिशत वोटिंग हो जाय तो उन सभी प्रत्याशियों की ज़मानत ज़ब्त मानी जाय और उन सभी प्रत्याशियों को अगले 6 वर्षों के लिए चुनाव लड़ने से बाधित  करके पुनः नए प्रत्याशियों के  साथ नया चुनाव कराया जाय। यही नहीं चुनाव के आधे समय बीतने के बाद पुनः एक जनमत संग्रह कराया जाय  और  यदि जीतने वाले प्रत्याशी को पुनः जीतते समय मिले वोटों का 51 % से कम वोट मिलें तो उसका चुनाव निरस्त मान कर और उसे चुनाव से बाधित कर नया चुनाव कराया जाय।देखिये जनप्रतिनिधिओं ,उनकी पार्टियों और लोकतंत्र में कुछ बदलाव आते हैं या नहीं ?शुभस्य शीघ्रम।

 

“दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

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