#Lekh By Dr. Arvind Jain

नव वर्ष के जोश  में होश न खोएं ! —-डॉक्टर अरविन्द जैन भोपाल
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मनुष्य वर्तमान में इतना अधिक तनाव ग्रस्त और
भयग्रस्त हैं वह जीवन में मनोरंजन चाहता हैंऔर मानवीय मूल्य उत्सव युक्त
हैं .तनाव से यानि नौकरी ,व्यापार,परिवार में वह तनाव ग्रस्त हैं व्यापार
में उतार चढ़ाव होने से उसका मन मस्तिष्क दिन रात अस्थिर होने से तनाव और
भविष्य के प्रति भय से चिंतित होता हैं और उसने अपने इतने अधिक मन में
सोच ,नकारातमक विचारों को संगृहीत कर लिया हैं की वह हमेशा   अदृश्य भय
से भी ग्रस्त हैं . भारत वर्ष में कहा जाता हैं की यहाँ सात वार और नव
त्यौहार मनाये जाते हैं .यानि प्रत्येक दिन त्यौहार ,उत्सव ,महोत्सव
,जयंती के रूप में मनाये जाते हैं .और हमारे लिए प्रत्येक दिन होली
,दीवाली जैसा होना चाहिए पर हम कुछ अवसरों को ही उत्सव के रूप में मनाते
हैं.
जैसा विश्व में चलन हैं की एक सप्ताह पूर्व से नव
वर्ष का आयोजन की तैयारी शुरू हो जाती हैं .इसमें हमारे देश में भी उत्सव
की अलग अलग मान्यताएं हैं जैसे नव वर्ष सवंत्सर चैत्र से मनाते हैं उसको
मनाने में कोई ऐतराज नहीं हैं पर कुछ लोग लकीर के फ़क़ीर होने से उसको
मनाने में अपना सुख मानते हैं .कुछ अपने अपने धार्मिक परम्पराओं के हिसाब
से अपना अपना दिन नव वर्ष के रूप में मनाते हैं और नव वर्ष यानि एक जनवरी
का विरोध करते हैं और करना भी चाहिए फिर जनवरी का उपयोग क्यों करते  हैं
या फिर वर्ष 2018   का उपयोग क्यों करते हैं ? दूसरा आज किसी से पूछो ये
कौन सा संवत चल रहा हैं और देशी कौन माह चल रहा हैं नहीं मालूम  .विरोध
करना उचित हैं पर तर्कों के आधार पर  स्वस्थ हो .मात्र विरोध करना
उद्देश्य न हो ..
जैसा की मालूम हैं की वर्ष के आखिर सप्ताह में
छुट्टी होने से मौज़ मस्ती ,घूमना फिरना और उत्सव जैसा मूड बनाकर रहना
,अपने ग़मों से बेगाफ़िल होना होता हैं और इस दौरान पूरा विश्व इनमे सराबोर
रहता हैं .इन दिनों सबसे अधिक विभिन्न प्रकार की घटनाएं ,दुर्घटनाएं
सामान्य तौर पर होती हैं,उसका कारण हमारा आर्थिक उन्नयन होना .हमने इतना
धन संचय कर लिया हैं या हैं की उसका उपयोग, दुरूपयोग हो जाता हैं जैसे
अधिकांश रोड एक्सीडेंट होते हैं उसका मुख्य कारण शराब ,नशा का होना ,फिर
अनियंत्रित वाहन चलाना ,और बे समय यानि रात्रि के समय बेलगाम स्पीड से
गाड़ी चलाना .दूसरा किसी किसी  शहर में वाहनों का इतना अधिक सड़क पर होना
की सड़क में भीड़ के कारण वाहन का न निकल पाना जिससे भी लड़ाई झगड़ा का होना
स्वाभाविक हैं और सबसे अधिक झगड़े होटल, क्लब, पब में होते हैं .आजकल
मर्यादाविहीन समाज का होना जिसमे डांस होना ,शराब या नशा का होना और वहां
लड़का लड़कियों के होने से एक दूसरे पर रौब बताने के लिए छोटी छोटी बात पर
झगड़ा ,,मुंहवाद के साथ छुरा ,पिस्तौल का उपयोग होने से कार्यक्रमों में
रंग में भंग होना आम बात हैं,
आजकल पांच सितारा संस्कृति का चलन होने से उन होटल में
शराब ,कबाब ,शबाब होने से अपने आप वहां का वातावरण हिंसक दिखाई देता हैं
और अनुभूति होने लगती हैं .नशा खोर अपने आप में नियंत्रित न होने से
,खाने की टेबल पर कांटे छुरी होने से और होश में न होने के कारण कुछ भी
शक या संदेह पर लड़ना और जहाँ नवयुवतियां होने से झगडे की आशंका अधिक होती
हैं .नवयुवतियों की ड्रेस भड़कीली और नशायुक्त  होने से स्तिथियाँ अचानक
बन जाती हैं .इसमें किसी का दोष नहीं हैं पर ये सब अचानक बनती हैं इसमें
कोई पूर्व योजना नहीं होती .इस समय कोई भी होश में नहीं होता हैं ऐसा
क्यों .?
वैसे हमारे देश में धार्मिक त्यौहार हमेशा व्रत ,पूजा
,विधान और उपवास से किये जाते हैं पर नववर्ष का त्यौहार मौज मस्ती का
आयोजन होने से हर वर्ष झगड़े ,एक्सीडेंट ,आगजनी ,या रंगरेलियों के तौर पर
अवैध लड़के लड़कियों का नशे की हालत में पकड़ा जाना और रोड एक्सीडेंट होना
या शराब के नशे में  हो हल्ला करने से होता हैं जिसको रोकने पुलिस को
कार्यवाही करना पड़ती हैं उस कारण भोगी जनों का वर्ष की शुरुआत पुलिस
स्टेशन ,जेल या अस्पताल से होती हैं क्या   ये अच्छी तस्वीर होती हैं .
इस त्यौहार को मजेदार मनाने का तरीका ऐसा होना चाहिए
जिससे स्वयं न परेशानी उठायें और हम अपने धन समय का उपयोग रचनात्मक के
साथ सदुपयोगी मनाये.जैसे सामान विचार धारा के लोग अपने अपने समूह में
बैठे और मनोरजन करे और सबसे अच्छा अपने घरों में परिवार जनों के साथ
उल्लासमय वातावरण में कुछ पल बिताएं जिससे आप अनावश्यक खर्च के साथ ,उन
आदतों या वातवरण से बच सकते हैं . यह सबको बाध्य नहीं हैं ,कारण जिनके
पास इफरात पैसा और कूबत हैं उन्हें जरूर करना चाहिए और करते भी हैं और
करेंगे पर जोश में इतना होश रखे की वह जोश गले की फांसी न बन जाए.जिसके
कारण व्यक्ति अपना मुंह छिपाते न फिरे जैसे लड़कियों के अड्डे में पकडे गए
लड़के लड़कियां ,या शराब   पीते हुए पकडे गए या आपत्तिजनक स्थिति में पकडे
जाने पर मुंह छुपाते हुए.उस समय क्यों नहीं अपने आपको खुले आम पेश आने
में परहेज़ करते .हम वास्तव में विश्व के अनुरूप चलना चाहते हैं .क्या
हमारे देश की सभ्यता इन सबको बर्दाश्त करने को तैयार हैं ,हमारा समाज
,परिवार इनको अंगीकार करेगा या पिता माता अपनी औलाद से यह अपेक्षा रखती
हैं ? यदि उत्तर हां में हैं तो जरूर खुल कर करों .
बुराइयों को मत ग्रहण करो और अच्छाइयों को अपनाओं
जैसे वर्षा ऋतू में गन्दगी में से नमी सूरज सोख लेता हैं
वैसी ही आदत या प्रवत्ति से हम सुखी हो सकेंगे
मनोरंजन शोकरंजन   दुःख रंजन या स्व पर मुख देखानी न बन जाये
घटना   दुर्घटना घटने पर  परिवार  पर ही विपत्ति आती हैं
स्वयं काल कलवित होने से उसका दुःख सहना पड़ता किसको
और बच गए तो हुए अपंग ,बीमार तो भक्तों जिंदगी अपनी खुद
त्यौहार मनोरंजन ,उल्लास, आनंद का होता हैं
कुछ नए सरोकारों को अपनाएं यही होगा सच्चा नया वर्ष
डॉक्टर अरविन्द जैन  संस्थापक शाकाहार परिषद् भोपाल 09425006753

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