Lekh by dr arvind Jain

पद ,पैसा ,प्रतिष्ठा और पुरुस्कार —-
भाई मुरारी की उम्र चालीस साल की कब होगयी उन्हें पता तक नहीं चला .कारण वेचारे को पच्चीस साल लग गए बी,ए.की डिग्री लेने में. उसके बाद पढाई पढाई करते समय आराम प्रेमी होने से अधिक आराम में उनका विश्वास. उनका विश्वास हैं की मनुष्य को आराम मौलिक आधार के साथ मिलना चाहिए. चाहे हम पढ़े या नौकरी करे या व्यापार . तभी तो उनको पच्चीस साल लग गए डिग्री लेने में.फिर उनमे गुणात्मक वृद्धि हुई और उन्होंने कहा कि   स्वतंत्र पैदा हुआ हु तो में क्यों किसी की गुलामी करू.तो उन्होंने रोड इंस्पेक्टरी करना शुरू की. इससे यह फायदा हुआ कि इनके सामाजिक ,राजनैतिक और अपराध में ज्ञान खूब मिला. पुलिस से भी मित्रता होने से पुलिस ने कई बार अपना मेहमान बनाया.पर सिर्फ थाने तक का.कभी एक रात या रात दिन .जैसे जैसे रहते ज्ञान का भंडार बढ़ता जाता.
कभी यहाँ वहां भटक भटक कर उनको साहित्य से भी प्रेम हो गया. और धार्मिकता ने इतना अधिक प्रभावित किया कि उनके मन में सर्व धर्म समवाय कि विचार धारा फूट पड़ी .वैसे मुरारी भाई को समाचार पत्र कि जरुरत नहीं पड़ती कि कौन सा कार्यक्रम कब कहाँ होना हैं और उसमे कहाँ भोजन या नाश्ता कि व्यवस्था हैं .और कही  नहीं तो गुरुद्वारा का लंगर कही नहीं छूटा.उन्होंने अपना हुलिया ऐसा बनाया जिससे वे नेता ,अभिनेता, पत्रकार ,सामाजिक कार्यकर्ता ,धार्मिक और साहित्यकर्मी या साहित्यकार भी मान लिया जाता और कभी कभी पोस्टमैन का भी काम करते. कारण कुछ नहीं तो कुछ पैसे वालों के यहाँ के स्थायी नव रत्न  में से एक होते .उनको रोज़ कहीं न  कही का आमंत्रण मिल जाता या खबर भर मिलने पर पहुँच जाना.
इस क्षेत्र में लगभग पंद्रह वर्ष गुजारने के बाद उनकी ख्याति समाज में और सब जगह होने लगी. इससे उनका आत्मबल बढ़ा .और पंद्रह वर्षों में सैकड़ों कार्यक्रम देखने और बैठने से उनको भी लगा कि उन्हें भी कुछ प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए. वे भी पुरुस्कार पाने के हक़दार हैं . अब तक उन्हें भी बहुत अनुभव हो गया था कारण उन्होंने सब जगह ,सब समाज में घूम घूम कर खाना  /परसादी /लंगर खाया तो उनके ज्ञान के चक्षु बहुत अधिक खुल गए थे और खुलते जा रहे थे.
समस्या थी कि अब करे क्या. ?तो उन्होंने सबसे पहले नित्य मिलने वालों से इस बात का जिक्र किया और अपना दुःख भी बताया .कुछ लोगों ने तो बकायदा   एक मीटिंग की भाई   मुरारी के विगत वर्षों के कृत्यों का मूल्यांकन कर उन्हें  सबसे पहले पुरुस्कृत किया जावे .मुरारी की इच्छा भी थी की उन्हें पुरुस्कार मिले. कारण जब एक गरीब ,दुबले पतले अंधे और क्वारे से भगवान् प्रसन्न  हुए तो कहाँ भाई तुम एक वर मांग लो .तो अंधे गरीब ने एक वर माँगा “भगवान्  में अपने बच्चे को सोने की चम्मच से खाना खिलाते हुए देखना चाहता हूँ . उससे उसकी गरीबी ,अंधापन  दूर होकर और बच्चे के लिए बीबी मिल गयी.” भगवान ने तथास्तु कर दिया.
मीटिंग में यह तय हुआ की आगामी होली में मुरारी को पुरुस्कार दिया जावे . समय अधिक हैं इसीलिए मुरारी ने अपने दोस्त के द्वारा यह प्रस्ताव भी कहलवाया की इनके पुरूस्कार के समय एक स्मारिका भी निकाली जाए  और उसमे व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश के साथ विज्ञापन भी लिए जाए जिससे आर्थिक लाभ भी हो सके.
होली का दिन सब मस्ती में शहर के सब क्रायक्रम स्थल पहले से भरे और अब सम्मान कहाँ से करे वो भी प्रतिष्ठा के अनुरूप? और उसमे सभी वर्गों को बुलाया जाय. भगवान् के प्रति सच्ची लगन होतो क्या मुश्किल .? कुछ नहीं .मुरारी ने खुद अपने निमंत्रण पत्र लिए और बांटे.साथ में कह दिया आना जरूर नहीं तो समझ लेना ……! कारण भाई मुरारी शहर के चलते फिरते इतिहासकार और जानकार .कौन कहाँ क्या करता ,कहाँ जाता ,कौन से कैसे कैसे सम्बन्ध इत्यादि?!
बदनामी के डर से सब आये. मंत्री से लेकर संत्री ,धार्मिक से सामाजिक और साहित्य से लेकर आपराधिक . जैसा चलन और परमपरा के अनुसार भाई मुरारी के व्यक्त्तिव ,कृतित्व और सामाजिक योगदान का गुणगान हुआ और प्रशस्ति पत्र में  बताया कि  ये ” सर्व धर्म समवाय की  जीती जागती मिशाल हैं .कोई भी समाज ,जाति,वर्ग ,का कार्यक्रम इनकी उपस्थिति के बिना अधूरा. इन्होंने जब से होश सम्हाला देश कि खाद्य समस्या पर ध्यान दिया न शादी की या हुई नहीं यह विषय व्यक्तिगत हैं पर इन्होंने कभी भी  अपने घर में न खाना बनाया या खाया .इनको भोजन की   इतनी  अधिक परख हैं कि किस समाज या किस पार्टी का भोजन कैसा होता हैं .? कुछ लोग इनके ज्ञान का उपयोग करते हैं ,शहर का कोई भी कार्यक्रम कैसा भी हो ,अवश्य जाते है  ,उस समय परेशां होते हैं जब एक ही समय दो तीन कार्यक्रम होते हैं .आप सब में समय पर पहुच जाते हैं .इन्होंने कभी वाहन का खर्च नहीं उठाया .कोई न कोई हितैषी का सान्निध्य मिलता रहता हैं .इन्होंने अपनी पोशाक से अपनी छवि बनाई .हमारी समिति इनका सम्मान कर अपने आपको गौरवान्वित महसूस करती हैं और इन्होंने स्मारिका के प्रकाशन में भरपूर विज्ञापन लेकर कीर्तिमान स्थापित किया हैं .इनका सब क्षेत्रों में अद्वतीय योगदान के कारण “नगर गौरव रत्न” से सम्मानित किया जाता हैं .” साथ ही दो जोड़ी पोशाक ,शाल , नारियल और चंद से इकठ्ठी रकमजो लगभग एक लाख रूपए हैं सौंपी जाती हैं साथ ही हम लोग इनके उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं .
इस समय भाई मुरारी  ने  सबके प्रति आभार व्यक्त किया. इससे भाई मुरारी को पुरुस्कार ,प्रतिष्ठा ,पद और पैसा मिल गया और उनके मन में आगे” “प्रान्तीय  नर गौरव  पुरूस्कार” की योजना की रूपरेखा तैयार होने लगी .
डॉक्टर अरविन्द जैन प्रान्तीय अध्यक्ष लेखक प्रकोष्ठ मध्य प्रदेश एवम शाकाहार परिषद् भोपाल 09425006753

69 Total Views 3 Views Today
Share This

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *