#Lekh by Dr. Mrs. Tara Singh

भूत

 

सृष्टि में कोई भी स्थान ऐसा नहीं है, जहाँ आत्मतत्व न हो , आत्मा का नाश नहीं होता है ; इसलिए इसे अविनाशी कहा गया है । जीवात्मा, इस देह में आत्मा का स्वरूप होने के कारण सदा नित्य है । जीवात्मा के देह मरते हैं ; आत्मा न किसी को मारता है, न ही मरता है । आत्मा अक्रिय होने के कारण किसी को नहीं मार सकता, जीवात्मा के शरीर उसके वस्त्र हैं । जैसे मनुष्य अपने पुराने वस्त्रों को त्यागकर नये वस्त्र पहनते हैं, उसी तरह यह आत्मा पुराने शरीर को त्यागकर नया शरीर धारण करता है । आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकता, जल गीला नहीं कर सकता, आग जला नहीं सकती , वायु सुखा नहीं सकती, न ही इसे छेदा जा सकता । यह आत्मा अचल है , स्थिर है, सनातन है, आत्मा अनुभूति विषय है, इसे व्यक्त नहीं किया जा सकता । यह आत्मतत्व ,एक आश्चर्य है, इसलिए कि यह अक्रिय होते हुए भी सब कुछ करता दिखाई पड़ता है । आत्मा शरीर में अधिदैव और अधियग्य ,दोनों रूपों से प्रतिष्ठित है । अधिदैव के रूप में यह कर्त्ता भोक्ता है , तो अधियग्य के रूप में दृष्टा है । इस तरह आत्मा ही सम्पूर्ण सृष्टि का आदि , अंत और मध्य है, अर्थात सम्पूर्ण सृष्टि आत्मा से जनमती है , और मुत्यु के बाद आत्मा इस संसार को छोड़कर निकल जाती है ।

विग्यान अभी तक आत्मा का रंग-रूप, आकार-प्रकार, वजन, माप-तौल आदि निश्चित नहीं कर पाया; मगर इतना तो अवश्य स्वीकार किया है , कि मनुष्य की मृत्यु के बाद आत्मा निकल जाती है । इस तरह मृत्यु जीवन का अंत है, जब कि गरुड़ पुराण में उल्लेख मिलता है, कि मृत्यु के बाद पुत्र पिंडदान नहीं करें तो मृतक की आत्मा अतृप्त रहती है, तब ऐसी आत्माएँ भूत बन जाती हैं । यही कारण है कि हिंदू संस्कृति में घर के द्वार के नजदीक, मृत्यु –स्थान पर , चौराहे पर, श्मशान में चिता की जगह, छ: पिंड भूत के लिए रखे जाते हैं । श्राद्ध-तर्पण

 

किये जाते हैं, जिससे मृतक की आत्मा को शांति प्राप्त हो, अन्यथा अतृप्त आत्मा ( मृत्यु के बाद ) भूत बनकर भटकती फ़िरती है । मोक्ष की प्राप्ति के बाद ही वह परलोक गमन करती है । भूत-प्रेत के अस्तित्व को पाश्चात्य देशों में वैग्यानिकों और परामनोवैग्यानिकों ने भी स्वीकार किया है ; उन्होंने सूक्ष्म शरीर के तत्व को एकाटोलाज्मा की संग्या दी है । भूत होने के विश्वास का समर्थन ब्रिटेन के सर आर्थर कानन डायल, सर विलियम बैरेट जैसे वैग्यानिकों ने भी किया है ।

शरीर त्यागने के बाद कहाँ जाती हैं आत्माएँ :———

गरुड़ पुराण में मरने के पश्चात ,आत्मा के साथ होने वाले व्यवहार की व्याख्या है । उसके अनुसार आदमी अपने जीवन काल में जैसा कर्म करता है, उसके अनुसार उसे दूत लेने आते हैं । जो पुण्यात्मा है, उसके प्राण निकलते समय कोई पीड़ा नहीं होती; ठीक इसका उलट दुराचारी के साथ होता है ; उसे असह्य पीड़ा भोगनी पड़ती है । गरुड़ पुराण में यह भी उल्लेख है, मृत्यु के पश्चात यमदूत मृतक की आत्मा को केवल 24 घंटे के लिए ही ले जाता है । इस 24 घंटे के दौरान आत्मा को दिखाया जाता है, कि उसने कितने पाप और कितने पुण्य किये । इसके बाद उसे उसके मृत्यु स्थान पर छोड़ दिया जाता है जहाँ 13 दिन बाद ( उत्तर कार्यों तक ) वह वहीं रहती है । 13 दिन बाद फ़िर यमलोक यात्रा पर चली जाती है ।

पुत्र अगर पिंददान न करे तो, मृतक की आत्मा अतृप्त रहती है, और ऐसी ही आत्माएँ भूत बनती हैं । भूत-प्रेत के अस्तित्व को पाश्चात्य देशों में वैग्यानिकों और परामनोवैग्यानिकों ने स्वीकारा है । स्वामी अभयानंद ने अपने पुस्तक ’ लाइफ़ वियोंड डेथ “ में मृत आत्माओं के चित्र भी दिये हैं । पश्चिमी विद्वानों ने सूक्ष्म शरीर के तत्व को एकटोप्लाज्मा की संग्या दी है । लेकिन कुछ विचारकों का कहना यह भी है कि अतीत में लटकी आत्मा ही भूत बन जाती है , अत: जीवन न तो अतीत है, न भविष्य; यह तो सदा वर्तमान है, और वर्तमान ही मुक्ति की ओर कदम बढ़ाता है । आत्मा का कोई जाति-रंग नहीं होता, तो फ़िर कैसे मरे लोगों की आत्मा को भूत-प्रेत, राक्षस, पिचाश, यम शाकिनी, डाकिनी, चुड़ैल, गंधर्व आदि कहा जाता है ।

आयुर्वेद के अनुसार कुल 18 प्रकार के प्रेत होते हैं, भूत सबसे शुरूआती पद है । यूँ कहें, कि कोई आदमी जब मरता है , सर्वप्रथम भूत बन जाता है; उसी तरह जब कोई स्त्री मरती है (बुरे कर्मवाली ), तब वह डायन या डाकिनी बनती है । इन सभी पदों की उत्पत्ति अपने पापों-व्यभिचारों से, अकाल मृत्यु से, और श्राद्ध न होने से होती है । 84 लाख योनियों में से पशु-योनि, पक्षी-योनि, मनुष्य –योनि में जीवन-यापन करनेवाली आत्माएँ मरने के बाद अदृष्य भूत-प्रेत की योनि में चली जाती हैं । प्रेत-योनि में जाने वाले लोग अदृष्य ,बलवान हो जाते हैं , लेकिन ऐसी सभी आत्माएँ नहीं होतीं । यह तो आत्मा के कर्म और गति पर निर्भर करता है । बहुत से भूत ऐसे भी होते हैं, जो किसी योनि में न जाकर गर्भधारण कर मानव बन जाते हैं ।

कुछ लोग कैसी-कैसी अजीबोगरीब और बेतुकी बातों पर विश्वास करते हैं, कहते हैं, भूत-प्रेत एक नकारात्मक ऊर्जा, एक अदृष्य शक्ति होती है, जो कभी भी, कहीं भी हो सकती है । ये खुली आखों से दिखाई भले ही न दे, लेकिन कुछ ऐसे संकेत मिलते हैं कि आपके आस-पास कोई नकारात्मक ऊर्जा है । इससे हमें सावधान रहना चाहिये ; जब कि भूत-प्रेत और कुछ नहीं, एक अनजाना भय है; काल्पनिक मन: चित्रण है, जो हमें रात्रि के सुनसान जगहों में, श्मशान में, आदि जगह डराता है, कारण बचपन से हम अपने बुजुर्गों से, दोस्तों से, पास-पड़ोसियों से ऐसी कहानियाँ रूचि और विस्मय के साथ सुनते आये हैं । विग्यान मानता है कि ऊर्जा को न तो पैदा किया जा सकता है, और न ही नष्ट किया जा सकता है; यह केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होती है । जब तक हम जीवित होते हैं, तब तक हमारे शरीर में ऊर्जा विभिन्न रूपों में मौजूद रहती है । हमारे विचार, भावनाएँ भी ऊर्जा के ही रूप हैं । ऊर्जा सूक्ष्म तत्व है, जिसे महसूस किया जा सकता है; मृत्यु होने पर , ऊर्जा नष्ट नहीं होती, बल्कि वह हवा की तरह अदृष्य बरकरार रहती है ।

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