# Lekh By Dr. Swambhoo Salabh

अक्टूबर गांधी जयंती पर विशेष
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आज गांधी जयंती के मौके पर चलिये इस सीमांचल के इतिहास के कुछ पन्नों को फिर से पलटने की कोशिश करें…

हिमालय की उपत्यका में गंडक नदी की यह तटवर्ती भूमि वैदिक युग में अनेक ऋषि मुनियों एवं संत महात्माओं की साधना स्थली रही। प्राचीन काल में यह भूभाग लिच्छिवी गणराज्य के अंतर्गत था जहां प्राचीन भारत की सभ्यता और संस्कृति का अभ्युदय हुआ। कालांतर में यह भूभाग मगध साम्राज्य के अधीन भी रहा। मौर्य वंश के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य का गहरा संबंध इस भूभाग से था। महात्मा बुद्ध की इस तपोभूमि में सम्राट अशोक के स्तम्भ आज भी कई स्थलों पर मौजूद हैं। गुप्त वंश के राजाओं तथा हर्षवर्धन का भी इस क्षेत्र से संबंध था। फिर कर्नाटवंशी राजाओं ने भी यहां शासन स्थापित किया। अगले
कालखंड में यह क्षेत्र दिल्ली के अफगान शासन के अधीन आया। इस सल्तनत के पतन के बाद इस क्षेत्र पर मुगलों का आधिपत्य हुआ। इसी शासन काल में बेतिया राज की स्थापना हुई जिससे इस इलाके का भूभाग लीज पर लेकर अंग्रेजों ने यहां अपना वर्चस्व स्थापित किया।
चंपारण का यह भूखंड अंग्रेजों के शासन काल में भी चर्चित रहा। नील की पैदावार के कारण उनकी खास दिलचस्पी इस क्षेत्र में रही। यहां उन्होंने अपनी कई कोठियां स्थापित की।
इस जिले का अधिकांश हिस्सा बेतिया राज के अधीन था। अंग्रेजों से लिए गए कर्ज के एवज में जब से बेतिया राज ने इस इलाके की जमीन उन्हें बंदोबस्त कर दी तभी से अंग्रेजों का प्रभुत्व इस क्षेत्र में बढ़ना शुरू हुआ और धीरे धीरे चंपारण का अधिकांश हिस्सा उनके अधीन हो गया।
अंग्रेजी राज में खेतिहर किसान अपनी जमीन के 3/20 हिस्से में नील की खेती करने के लिए कानूनन बाध्य थे। सौ वर्षों से अधिक समय तक वे निलहे साहबों के शोषण और दमन का शिकार होते रहे।
भितिहरवा निवासी पं. राजकुमार शुक्ल के आग्रह पर आज से ठीक 100 साल पहले 1917 में महात्मा गांधी यहां के किसानों की दुर्दशा देखने चंपारण आये। यहां के लोगों के दुःख दर्द को समझा, आत्मसात किया और यही भूमि सम्पूर्ण भारत की स्वतंत्रता के निमित्त उनकी कर्मभूमि बनी।
यहीं से सत्याग्रह के रूप में सत्य और अहिंसा का जो प्रयोग उन्होंने आरम्भ किया उसकी प्रतिध्वनि भारत के कोने कोने में सुनायी दी और अंततः उसी प्रयोग ने न सिर्फ चंपारण के किसानों को तीन कठिया कानून से मुक्ति दिलायी बल्कि वही प्रयोग भारत के स्वाधीनता संग्राम के लिए मील का पत्थर साबित हुआ।
महात्मा गांधी के आह्वान पर 1921 में रक्सौल के पुराने एक्सचेंज रोड में राष्ट्रीय विद्यालय की स्थापना हुई जो स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में क्रांतिकारियों की शरणस्थली भी बनी। स्व. महादेव देसाई की डायरी के पन्ने इस घटना क्रम की पुष्टि करते हैं। Recollected works of Mahatma Ganghi Vol 15 में भी इसका जिक्र मिलता है।
9 दिसम्बर 1920 को महात्मा गांधी रक्सौल आये थे। डा. राजेन्द्र प्रसाद, मजरूल हक और शौकत अली भी उनके साथ थे। यहां के पुराने एक्सचेंज रोड स्थित हरि प्रसाद जालान की पथारी में उन्होंने भाषण दिया था। उस सभा में रक्सौल के साथ सीमावर्ती क्षेत्र के लोग भी शामिल हुए। उन लोगों ने आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन में भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया।
गांधी के चंपारण सत्याग्रह को व्यापकता में देखें तो यह सत्याग्रह केवल यहां के किसानों को अंग्रेजों के शोषण से मुक्त कराने के लिए नहीं था बल्कि इसी सत्याग्रह ने स्वाधीनता का शंखनाद किया और यहीं से अंग्रेजी राज के खिलाफ आंदोलन पूरे देश में फैला। इसी चंपारण की भूमि ने गांधी को महात्मा बनाया।
चंपारण सत्याग्रह भारत के स्वतंत्रता संग्राम की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है और इसके 100 साल पूरे होने पर यहां के लोगों को यह आत्मचिंतन करने की आवश्यकता है कि इतने गौरवशाली इतिहास के बावजूद भी यह सीमांचल विकास की मुख्य धारा में शामिल क्यों नहीं हो पाया। आखिर क्यों ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व होने के बावजूद यह क्षेत्र उपेक्षित पड़ा रहा। आखिर क्यों यहां राजनैतिक और सामाजिक संकल्प शक्ति का अभाव बना रहा। महात्मा गांधी ने जो लौ यहां के लोगों के दिलों में जलायी वह समय के साथ मद्धिम कैसे पड़ गई। यहां के लोग उस सत्याग्रह को कैसे भूल गए।
कैसे यह क्षेत्र विकास की मुख्य धारा में जुड़ेगा, कैसे हमारी सरकार और हमारे जन प्रतिनिधि इसके सर्वांगीण विकास के लिए प्रतिबद्ध होंगे, कैसे इस क्षेत्र के विकास की लंबित योजनाएं पूरी होंगी, कैसे यहां की ज्वलंत समस्याओं का समाधान होगा, आज इसी विषय पर विमर्श किये जाने की आवश्यकता है।
इस नगर के गौरव को पुनर्स्थापित करने, इसे स्वच्छ, सुंदर और समृद्ध बनाने का संकल्प लेते हुए आज के दिन हर कोई अपनी अपनी क्षमता के अनुरूप जवाबदेही तय करे तभी सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत होगी और यही उस महामानव के प्रति सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी…

– डा. स्वयंभू शलभ

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