#Lekh ek Vyan by Mukesh Kumar Rishi Verma

कवियों के लिफाफे (हास्य व्यंग्य)

—————————————

 

वीर रस, श्रृंगार रस, हास्य रस, वैराग्य रस और न जाने कितने रसों से कवियों का मंच सजा था | तरह-तरह के रसों की गंगा-जमुना बह रही थी, पर इस विभिन्न प्रकार के अलग-अलग स्वाद वाले रसों का पान करने वाले बहुत ही कम थे और जो थे, वे अपने स्मार्ट फोन रस में ही मग्न थे | उन बेचारों से मंच संचालक बीच-बीच में तालियों का निवेदन करता | वे भी एक हाथ से ताली बजा ही देते, इसलिए ध्वनि प्रदूषण भी नहीं हो रहा था |

 

चार-पांच घंटे बाद रसों की गंगा-जमुना बहनी बंद हुई, तो बारी आई कवियों के लिफाफों के वितरण की | 101, 501, 1100, 2100 ₹ के अलग-अलग रेट वाले लिफाफे कार्यक्रम आयोजक ने भेंट कर दिये | मूल्य कम, मूल्य ज्यादा देख सभी रस आपस में घुसुर-पुसुर करने लगे | पता नहीं क्षणभर में क्या हुआ ? हुआ क्या चक्रव्यूह की रचना हो गई और फिर हो गयी शुरूआत महाभारत की |

 

वीररस ने अपना 501 का लिफाफा छिन्न-भिन्न कर दिया और जिस कुर्सी पर विराजे थे उसी को अस्त्र-शस्त्र बनाकर कार्यक्रम आयोजक रूपी असुर पर टूट पड़े | यह देख वैराग्य रस ने भी अपना 101 का लिफाफा हवा में टुकड़े – टुकड़े करके उछाल दिया और बहती गंगा में हाथ धौ लिए… |

 

श्रृंगार रस और हास्य रस 1100 और 2100 के लिफाफे लेकर पता नहीं कब फुर्र हो गए | लेकिन श्रोता अभी भी सुध-बुध खोये अपनी जान से भी ज्यादा प्रिय वस्तु स्मार्ट फोन पर आंखें गड़ाये बैठे हैं | उन बेचारों को तो पता ही नहीं चला कब महाभारत शुरू हुआ और कब खत्म हुआ | ग़नीमत रही कि ये कवि सम्मेलन पूर्णतः सफल रहा | दूसरे दिन सुबह-तड़के अखबारों में पढा |

 

 

– मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

गॉव रिहावली, डाक तारौली गुर्जर,

फतेहाबाद-आगरा, 283111

Leave a Reply

Your email address will not be published.