#Lekh By Jitendra Shulkla

शिक्षा का पतन
देश में बहुत से स्कूल कॉलेज विश्वविद्यालय खुल गये है | सरकारे भी कहने लगी है कि शैक्षिक दर में वृधि  हुई है |
हाँ ये मानना पड़ेगा की देश में साक्षरता दर बढ़ी है  | ज्ञान आया है ये प्रश्न  चिन्ह है ?
अधिकांश लोग मैकाले की शिक्षा के विरोधी है , कही न कही मै भी हूं , उस परिस्थितियों में उस परिप्रेक्ष्य में सही था | सभी चीज़े सभी काल समय में सही नहीं होती ,परिवर्तन प्रक्रति का नियम है | तो शिक्षा भी उससे अछुती नहीं हो सकती ,आज जो देश या दुनिया की तस्वीर है | वो मिश्रित वर्ड सिटीजन शिप की है | एक देश में जन्मा बच्चा दुसरे देश में शिक्षा पा कर तीसरे देश में काम तलाशता है | कहने का अर्थ ये है कि शिक्षा प्रणाली को विश्व स्तर पे खड़ा करना होगा |
देश में जितने भी उच्च शिक्षा संस्थान है  , उनका शैक्षिक स्तर देखे तो ज्ञात होता है , की हम अब भी दुनिया की दौड़ में काफी पीछे है | अभी जो विश्वविद्यालयो की लिस्ट आई है उनमे 250 में भारत का कोई नहीं है |
देश में बहुत प्रगति और उनती की बाते हो रही है | लेकिन क्या कहा तक सार्थकता है ,  कहना कठिन है |
देश को आजाद हुए 70 साल हो गए | विकास का जो गति है बहुत ही मंद है | जापान जैसे देशो में बुलट ट्रेन चल रही है | यहाँ की पसेंज़र ट्रेनों के रोज़ एक्सीडेंट होते है | कारण हम नहीं खोजते उत्तर पहले से रेडीमेड तैयार है |
वर्तमान में जापान से बुलट ट्रेन खरीदी जा रही है तकनीक के रूप में हम कितना पिछड़ गए है |
कारण क्या है शिक्षा ? हम देश में उच्च स्तर की शिक्षा की व्यवस्था नहीं कर पा रहे है |तभी तो हम को बहार से तकनीक खरीदनी पड़ रही है | अगर जरूरत है शिक्षा में सही दिशा की ,जो नेताओ की हठधर्मिता के कारण दिशा हीन को कर भटक रही है | और शिक्षा माफियाओ की जेबों को भर रही है | शिक्षा का जो बाजारी करण किया गया है , जिसके परिणाम स्वरुप कॉलेज की बिल्डिंग तो काफी खुबसूरत और आकर्षक है , किन्तु ज्ञान खो रहा है |
सरकारी शिक्षा तो सरकारी अस्पतालों की ही भांति हो गयी है ,सरकारी तंत्र में शिक्षा का नंबर बहुत बाद में आता है |  सरकारी तंत्र की शिक्षा दिन बा दिन बद से बत्तर होती जा रही है |  सरकारे भी प्राइवेट  स्कूल की तरह सुदर विद्यालय भवनों के निर्माण में गतिशील है | लेकिन शिक्षा की गुणवता बढ़ाने और छात्रो को विभिन्न कौशलो में निपुण बनाने की सरकारी सदइच्क्षा  के बावजूद स्थिति बद से बत्तर होती जा रही है | बिहार में मध्यमिक शिक्षा परिषद् के दो साल के परिणामो पर द्रष्टि डाले तो जो तथ्य और सत्य सामने आते है वो शिक्षा को ही नहीं वरन मनुष्य की मनुष्यता को भी कलंकित करते है |
जो एक बड़े और व्यापक पैमाने पर धांधली सामने आ रही है | उससे यह बात साफ सिध्य  होती है कि सरकारे केवल कठपुतलिया मात्र है और व्यवस्था में घुन लग चूका है और खोखली होती जा रही है |
आज  दुनिया में शिक्षा के लिए कितने बड़े बड़े संस्थान है  कल के भारत में भी थे लेकिन आज की स्थिति में सब पतन की और जा रही है | आज नित नए विचार जन्म रहे है , सिद्धांत  नए विचार नयी सोच नयी तकनीक जन्म ले रही है | लेकिन भारत में शिक्षा संस्थान अपने अपने टोटको यही अकादमिक नवाचार के साथ कटिबद्ध है | परिवर्तन चाहते ही नहीं है | अधिकांश शिक्षण संस्थान अपनी यथा स्थिति वाद को भी बरक़रार रखे है | और वो वैसे ही संतुष्ट है जैसे है |
आस -पास के प्रदेशो में नक़ल और अधिक अंक प्राप्ति के कितने अनुचित तरीके अख्तियार किये जा रहे है | और फर्जी अंक पत्र और प्रमाण पत्र बन रहे है | अब शिक्षा का उद्देश्य  केवल और केवल नौकरी अर्जित करना मात्र रह गया है , तो ऐसे परिवेश में कौन अपनी सत्य वादिता और नैतिकता को बचाए रह सकता है | अभी नया उत्तर प्रदेश में  जो प्राथमिक शिक्षा में अध्यापको की भर्ती हुए है | उनमे भी यही प्रयोग धर्मिता दिखलाई देती नज़र आती है | और वही अब देश के भावी कर्ण धारो के निर्माता है | शिक्षा की जिस प्रकिया से जो छात्र निकल रहे है ,उन्ही में कुछ अध्यापन के पेशे में भी आ जाते है और अपनी कार्य कुशलता को अपने प्रद्द्त अनुभव काम चलाऊ जुगाड़ से चलाते है | ,तो कहा और किस दिशा में जायेगा भविष्य हम कल्पना कर सकते है | आज जो परीक्षा लेने वाली संस्थ्याए है , वो भी ज्ञान ,बुधि ,और कौशल का खुले आम कलंकित कर रही है | इसके आज ही से  घातक परिणाम दिखायी देते है निकट भविष्य में क्या स्थिति होगी कल्पना करना कठिन है |
सरकारे किसी कमेटी को नियुक्त कर जांच दल के रूप में अपने आप को कर्ताव्यमुक्त हो जाती है | जाँच रिपोर्ट भी भारतीय न्याय व्यवस्था की ही तरह से है ,की आदमी को मरणोपरांत सजा या न्याय प्राप्त ही हो जायेगा | शिक्षा की जिस प्रकिया के हम अंग है या कहे की जिस व्यवस्था में पर परिपोषित हो रहे है वो जुगाड़ तंत्र की है ,दाव-पेच के सहारे काम निकलना है |और कही न कही जाब को पाना है | या धनोपार्जन या जीविकोपार्जन तो करना ही है |
छात्र भी सोचने को मजबूर हो जाता है की नैतिकता जीवन को सफलता दे रही है ?
क्या मौलिक नैतिकता उपयोगिता वाद के सामने हीनता महसूस कर रही है | इसी का परिणाम यह है कि जो बोद्धिक व्यक्ति है अगर वो अपराधिक कार्य करता है तो भी बड़ी कुशलता से करेगा | और उसकी जगह प्रति नियुक्त पाने वाला अल्प बोधिक  क्या उस कार्य को उतनी ही कुसलता के साथ कर पायेगा | शिक्षा का सही दिशा में संचरण न हो पाना ही देश की दुर्गति का कारण है | शिक्षा आज ऐसे मुकाम को तलास रही है जो देश को सही दिशा और दशा दे |
शिक्षा हमारे जीवन का मार्ग प्रसस्त करती थी ,वही शिक्षा आज हमें तनाव और हीनता की ओर ले जा रही है | अगर शिक्षा में जल्द ही बदलाव न किया गया तो वो दिन दूर नहीं जब देश की नव पीढ़ी तनाव और नशाखोरी में अपने आप को पूर्णता से डूबा लेगी | जब भी कोई आदमी तनाव से ग्रस्त होता है वो अवसाद के गहरे अंधेरो में चला जाता है | दिनों दिन मंहगी होती जा रही शिक्षा देश को किस मार्ग पर ले जा रही है | और शिक्षा के पश्चात प्लेसमेंट का आभाव छात्र को कुंठित ही नहीं अभी अभी मनो विकृत भी कर देता है जो देश और दुनिया समाज के लिए बहुत ही घातक परिणाम के रूप में दिखाई देता है |

– जीतेन्द्र  शुक्ल
शोधार्थी जैन विश्व भारती

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