#Lekh by Jitendra Yadav

आज फिर से हाफ डे?
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इस video ने Employees के मानस पटल पटल पर ऐसा पत्थर पटका है कि लोग फोन से फन काढ़े नागिन डांस करते फिर रहे हैं। सबको इसमें अपनें वर्तमान या भूतपूर्व Boss अक्स साफ-साफ दिखाई दे रहा है लेकिन अपनें चेहरे पे जमी धूल नजर नहीं आ रही।

मेरे एक भूतपूर्व colleague मि. Pandey नें whatsapp पे ये Video भेज बकायदा Call करके देखनें का अनुरोध किया। ये वही Pandey जी थे जिनका Average Working Hour कभी 4 घंटा भी नहीं रहा जिसकी वजह से उनको Termination से सम्मानित किया गया।

Mrs. शर्मा मेरा दोनों हाँथ पकड़ खुद से system lock कर लगभग घसीटते हुए बाहर ले के जाती हैं ये Video दिखानें के लिए, जो कि 11:30 बजे office पहुंच Boss के आनें तक serials, Makeup और ड्रेस discuss करती रहती हैं और ठीक 5 बजे उनके कानों में बच्चे के रोनें की आवाज गूँजनें लगती है और जी घबरानें लगता है।

हमारे मित्र गुप्ता जी जिनका पैसा हीं ईमान है पैसा हीं धर्म है जो कि कहीं 100₹ भी अधिक मिलनें पर Resign डाल दे देते हैं वो अपनें जैसे 5 लोगों के साथ कैफेटेरिया में चाय पीते हुए मालिकों/Boss लोगों के मतलबखोरी और हरामखोरी पर ज्ञान पेल रहें हैं।

हालांकि video में सिक्के के एक पहलू को हीं दिखाया गया है और उसमें भी साफ-साफ 9 Hour without interruption और काम पूरा करनें की बात है लेकिन लोग focus सिर्फ extra Hour Working पे हीं कर रहे हैं। काफी हद तक मैं भी न सिर्फ असहमत हूँ बल्कि भली-भाँति परिचित हूँ इस Tendency से जो कि गलत भी है।
कई बार मुझसे भी काम के बजाय Roster का time पूछा गया है लेकिन इसका मतलब ये कत्तई नहीं है कि कोई बाँध के रखना चाहता है आपको।
मुझे याद है मेरे एक Employer जो कि extra Hour के लिए बदनाम थे वो मेरे हाँथ में Laptop की जगह Mobile देखते हीं बोल पड़ते थे “Sir अगर काम हो गया है तो चले जाइये” वहीं किसी Consignment की details में विलम्ब पर रुकनें का निवेदन भी करते थे।

मौसम और शरीर की तरह Business की भी अपनीं requirement होती है और हर Employee को ये समझना चाहिए।
जिस तरह से हमको other than Salary, Bonus और Insentive की लालच रहता है उसी तरह Employer या Boss को एक्सट्रा Hour का, जो कि Natural है।

अगर कुछ अपवादों को छोड़ दें तो लगभग हर Employer/Boss/HR अपनें Employee को खुश रखना चाहता है और उनकी जरूरतों को समझनें का हर-संभव प्रयास भी करता है लेकिन हमें सिर्फ अपनीं जरूरतें समझ आती हैं लिहाजा कभी समन्वय स्थापित नहीं हो पाता।

Work is Worship के Principle को मानते हुए खुद को Boss की जगह रख कर, काम को अपना मानकर सोचिये कभी यक़ीनन आपको अपनें काम में दिलचस्पी, अपनें Orgnaisation से मोहब्बत हो जायेगी और इसतरह सफ़र आसान तो होंना हीं है।

नहीं तो जिस थाली में खायेंगे उसीमें छेद करेंगें वाली कहावत तो हइये है।

धन्यवाद

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