#Lekh (Kahani ) by Rameshwari Nadan

नादान का बचपन

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कुछ बातें ऐसी होती है जिसे हम कई बार किसी से नहीं कहते । वक्त के साथ-साथ हम शब्द देना भी भूल जाते है ।अचानक ही सौभाग्य से वरिष्ठ कवि आदरणीय श्री राजकुमार  सचान(होरी) जी से मुलाकात हुई । उनसे वैसे तो प्रथम मुलाकात थी ये ,पर लगा जैसे वर्षो से वो मुझे जानते है । जो कुछ उन्होंने मुझसे पूछा आज तक कभी किसी ने नहीं पूछा । न ही मैं सांझा कर पाई किसी से । उनसे बातें करते करते मैं रोने लगी ।  मेरे पतिदेव ये देखकर की मैं इतनी भावुक हो गई कि रो दी अचंभित हो गए ।जब आदरणीय होरी जी ने ये पूछा कि किससे मिला लेखन का ये गुण ओर मैंने कहा पिता से जिन्हें देखा भी नहीं पर सुना है वो डायरी लिखते थे ।ये बात मेरे पतिदेव भी नहीं जानते थे कि पिता से जो विरासत में मिला वो लेखन है ।बातचीत करते करते मेरा दर्द भरा बचपन एक बार फिर मेरे सामने आ खड़ा हुआ । पूरी रात मेरे बचपन ने मुझे सोने नहीं दिया ।आँखों ही आँखों में रात बीती ।

आज आप सब को अपने बारे में बताना चाहती हूँ ।मैंने ठीक से चलना भी नहीं सीखा था । कि पिता के हाथों से मेरी छोटी सी अंगुली हमेशा के लिए छूट गई । अनपढ़ माँ के मजबूत कंधों ने हम दोनों भाई बहन को संभाल लिया

था । बचपन तन्हाई में बीता । माँ पिता बनकर हमारी जरूरत को पूरा करती रही ।पर माँ गुम ही गई उस जिम्मेदारी में ।

जब अपने पिता के साथ किसी लड़की को स्कूल जाते देखती गोद में उठाते देखती तो सोचती काश मेरे भी पिता होते । पापा होते तो माँ घर में रहती मुझे दिन भर बन्द कमरें में नहीं रहना पड़ता अकेले । सहेलियों के पिता की तरफ आकर्षित होना स्वाभाविक ही था । उनमें अपने पिता को तलाशती थी । पर सहेली के पिता मेरे पिता तो नहीं थे न । अडोस पड़ोस के कुछ अंकल प्यार देते तो कुछ अपनी गलत निगाहों से बचपन को रौंदने को तैयार रहते । अच्छी बुरी नजऱ का फर्क उस उम्र में सीख गई जब गुड़ियों से खेलने की उम्र थी मेरी । वक्त के साथ तन्हाई ही मेरी हमसफ़र बन गई । बड़ा भाई था वो प्यार देता लाड़ करता ।पर माँ पिता का प्यार कैसे दे पाता । अक्सर बन्द कमरें में बैठी अकेले रोती । जरा सी आहट से डर जाती । फिर अपने भावों को अपने अहसासों को लिखने लगी मैं । तन्हाई में मेरी डायरी ही मेरी सहेली बनी । पिता की कमी सदा खली मुझे आज भी मुहँ से पिता शब्द नहीं निकल पाता । पहली बार ससुर जी को जब पापा नमस्ते कहा तो शब्द ही गले में अटक गये थे । और आँखे भर आयी थी मेरा दुर्भाग्य की ससुर जी को सिर्फ एक ही बार पिता कहा ओर  बहुत कम समय उनके चरणों में रही पर वो भी मुझे छोड़कर चल दिये । उनसे खूब बातें करती थी । मेरे ससुराल में ससुर जी से कोई बहु बात नहीं करती थी । पर मैं खूब करती सब कहते डर नहीं लगता तुम्हें । मैं कहती नहीं बिल्कुल भी नहीं । बहु नहीं बेटी बनकर उनके साथ समय बिताना चाहती थी । पर नियति ने उन्हें छीन लिया ।

बचपन तन्हाई में बीता अनुभव भी बहुत बुरे रहे मेरे बचपन के । अपने बचपन की तन्हाई को देखते हुए ही मैंने फैसला लिया कि मैं नोकरी नहीं करूंगी अपनी होने वाली सन्तान को वो प्यार दूँगी जो मुझे नहीं मिला । मेरा बचपन सुखद नहीं था । ईश्वर ऐसा बचपन किसी को न दे। सचान जी देखिये फिर से रो दी । आँसू शब्दों का  आकार लेकर आप सबके सामने है ।

लोग कहते है काश लौट आये उनका बचपन पर मैं कहती हूँ

न आना लौट के कभी

ऐ मेरे बचपन

सिसकी में डूबा तू

मेरा तन्हा बचपन

रामेश्वरी नादान

 

One thought on “#Lekh (Kahani ) by Rameshwari Nadan

  • April 20, 2018 at 7:32 am
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    Heart touching story dear

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