#Lekh by Kavi Piyush Sharma

एक बात मेरे मन मे मच्छर की तरह कान के पास चिल्ला रही है:—-

 

सम्मान में आप मूर्ख हो यह परिचय टोपियों के माध्यम से परिचय ललाट पर रखकर दिया जाता है। यह वर्त्तमान समय ही देखो###

कवियों को महामूर्ख ,आधा मूर्ख,मूर्खाधीरज ,मुर्खेश्वर ऐसे नामचिन्ह वाली टोपियां,उनको आलू बेगन गाजर मिर्ची वाली मालाए पहनाकर क्या उनका वाकई ही मंच पर जनता के बीच सम्मान किया जाता है।

क्या वाकई ही वह  इस दायित्व के काबिल है या यह दौर बदल गया क्यों कविवर उनको ही सम्मान मानकर उसके पक्षधर हो जाते है औऱ आसान तक ग्रहण भी कर लेते है की साब आपका धन्यवाद आपने हमे इस योग्य समझा और धन्यवाद ज्ञापित करते है।जो कवि उसके पक्षधर है वो उसे सम्मान मानते हैे क्या कृपया इस विचार का हल अवश्य करे या खण्डन करे में प्रतिक्षारत हु।और यदि यह सम्मान है तो में कहना चाहूंगा 100 बात की एक बात कवियों के साथ साहित्यक मंचो व सम्मान का स्तर बहुत नीचे गिर गया है और कुछ कार्यरत है जो पुनः साहित्यक निर्माण मंचो पर लाकर सन्देश की भावना को जन के मन तक अलख जगा रहे है।। यह पक्तियां देखे की:—

देश मे भगतसिंह की जवानी युवाओ में होनी चाहिए अब वर्तमान में यह शीला की जवानी मुन्नी की बदनामी जैसे  अशीशल सन्देश जन के मन तक पहुँच रही है।क्योंकि कहते है मुन्नी ने यह कर डाला  शीला ने इसको फोड़ डाला पर कोई यह नही बता पा रहा कि भगतसिंह की हत्या उनके कारनामे क्या थे।सोच,विचार मानसिकता जन के मन पर सब काई की तरह छा गयी है जिसे हटाना कवियों का काम है क्योंकि अपनी कविताओं के माध्यम से कवि देश मे परिवर्तन  लाना चाहता  है यह संभव भी हो सकता है पर सीना चौड़ा मन मे परिवर्तन यह भावना उसका परिलक्षित हो।मेरा मानना है कि आजकल सब उस काई में रोटियां सेकते हुए नजर आ रहे है। चाहे बुरी लगे यह सही पर कहते है हम इस पंक्ति की तरह है:–

 

##में नीम की तरह कड़वा पर असरदायक हूं।

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——–परिंदे की कलम से

—–कवि पीयूष शर्मा’परिंदा’

 

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