#Lekh by Kavi Sharad Ajmera Vakil

सुख क्या है दुख क्या है यह बड़ा ही गंभीर एवं पुरातन प्रश्न है और चला ही आ रहा है मनुष्य मन की जटिलता को समझना बड़ा ही मुश्किल है मन  विविध आयामी है मन बंदर समान चंचल है  इसे समझना दुष्कर है एवं सारी सुख दुख की लीला मन की ही रची हुई है सरल शब्दों में कहें तो जो हमारे मन माफिक नहीं हुआ तो दुख है हमारी किसी से कोई उम्मीद है और पूरी नहीं हुई तो दुख है पूरी हो गई तो सुख है मगर यह सुख क्षणिक बुलबुले के समान है घड़ी दो घड़ी का है फिर मन उस वस्तु से उठ जाएगा ।

 

सास चाहती है कि बहू आज्ञाकारी हो बहू चाहेगी की सास उसके मन की करें बस यहां थोड़ी भी कमी हुई तो अहं का टकराव होगा बाप चाहेगा बेटा कहने में चले बेटा चाहेगा बाप सब कुछ मेरे हवाले करें और मेरे कहने में चले तो यह होता है अहं का टकराव सेठ का नौकर से नौकर का सेठ, से देवरानी-जेठानी से जेठानी देवरानी से ,बस यही चलता रहता है अपने कर्तव्य कर्म को ईमानदारी से हंड्रेड परसेंट पूरा करना ही नहीं चाहता है सारे दुख खुद के ही पैदा किए हुए हैं सारे दुख अपेक्षा के पैदा किए हुए हैं मान लीजिए आप बाप हैं और आप पेंशन भोगी हैं पति-पत्नी हैं बच्चे हैं सब अपना-अपना कमा खा रहे हैं आप की सुख सुविधा का सब सामान आपके पास है अब अगर सास बहू से नहीं बनती है या फिर बाप बेटे की नहीं बनती है कहीं अहम का टकराव है तो अपने में समझदारी लाकर अपने अहं को छोड़ अपने को नरम कर लीजिए झगड़ा खत्म हो ही जाऐगा  है  नहीं होता है तो अलग अलग रहिये तू तेरे यहां सुखी  मैं मेरे यहां सुखी रहूं तीज त्यौहार पर यथायोग्य एक दूसरे की भावना के अनुरूप सम्मान सहित मिलना जुलना जारी रखिये  बस अहं को नरम करना है ।

 

अपेक्षा ही दुख का कारण हो जाएगी अगर आपके पास पर्याप्त आय का साधन है एक छोटा सा घर है आपका स्वास्थ्य औसत है आपके पास एक औसत बैंक बैलेंस है चाहे थोड़ा ही है आपका अपने जीवनसाथी के साथ बेहतर तालमेल है आपमें कुछ अच्छी आदतें हैं मतलब सामाजिक सरोकार से आप जुड़े हैं या आपके अंदर कोई क्रिएटिविटी है किसी भी तरह की जिसमें आपको खुशी मिले आप अपने क्रोध को काबू में कर लेते हो आप के कुछ अच्छे दोस्त हो तो और आपको क्या चाहिए अगर फिर भी आप दुखी होते हैं तो कहीं ना कहीं अपने अहम का दरवाजा टटोलिए अपनी कमी निकालने की आदत डालिए आप अपने शरीर को अपने हिसाब से नहीं नचा सकते वह भी आपका साथ नहीं देगा आप अपने मन को अपने हिसाब से नचा नहीं सकते वह भी साथ नहीं देगा तो आप अपने करीबी जनों को क्यों चाहते हैं कि वह आपके हिसाब से चलें आप चाहें तो अपने कायदा करिए बहू हैं तो आप अपने कायदे से रहिए पिता है तो आप अपने कायदे से रहिए पुत्र है तो आप अपने कायदे से रहिए अपनी गलतियों को सुधारने की कोशिश करिए अहम का टकराव टालिये और सबसे बड़ी बात है अपेक्षाओं को कम करिए मैं तो कहता हूं खत्म ही कर दीजिए इस काम में आप की मदद योगासन और प्राणायाम बहुत ही अच्छी तरह से करेंगे अगर आप कर्मकांडी हैं तो उसे थोड़ा कम करिए क्योंकि आप बाहरी क्रिया तो बहुत कर चुके हैं अब आपको अंदर ,अपने अंदर हृदय में ,अपने अंतस में झांकने की जरूरत है ।

 

55 ,60 साल के बाद की उम्र में तो हर आदमी को योग से खुद का योग कर लेना चाहिए बस इतनी सी बात जो कि आपके सुखी जीवन होने का रहस्य है ।

 

कुछ पॉइंट है

 

अपेक्षा कम रखिए  ।

 

अहं को टालिये   ।

 

अपने अंदर झांकिये  ।

 

अपनी गलतियाँ देखने की कोशिश करिये ।

 

अपने करीबियों की मदद को हमेशा तैयार बिना किसी स्वार्थ के रहिये  ।

 

नाती पोतो के साथ केवल अपनी खुशियाँ बांटिये । उनके साथ बच्चे हो जाईये मन बिल्कुल हल्का हो जाऐगा  ।

और सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण बात कि पूर्ण रूप से सात्विक और शाकाहारी हो कर योग अपनाईये  योग मतलब जोड़ना आत्मा को परमात्मा से मिलन की और खुद को मोड़िये फिर देखिए सुख आपके आगे पीछे घूमेगा

 

कवि शरद अजमेरा **””वकील””**

 

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