Lekh by Masneesh ( Mannu ) Bhatt

आदत से मजबूर हम

सभी को शायद ये लगे कि समाज बुरा और बुरा होता जा रहा है पर यकीन मानिये बस ये बात तो बेवजह मान लेने वाली है, मैंने एक दुनियाँ देखी है शायद आपने भी आपके आस पास इसे देखा हो। ये भी सम्भव है कि आप खुद इसका हिस्सा होकर भी इसे नकार रहे हो शायद मैं भी ऐसा ही कुछ कर रहा हूँ। मैं एक काल्पनिक दुनिया की बात करता हूँ, जो शायद मेरी इस दुनिया से मिलती ही है। एक सफ़र करते हैं अपनी मजबूर आदतों का।

वो शख्स  सुनसान किसी सड़क पर घूम रहा था शायद कोई वजह होगी जिससे परेशान होगा या फिर देश के हालात पर ये सोच के अफ़सोस कर रहा होगा कि आखिर लोगों को हुआ क्या है, क्या ये लोग सभ्य नहीं हो सकते,महिला का सम्मान नही कर सकते, देश की तरक्की में हिस्सा नहीं ले सकते आदि आदि । लेकिन ऐसा भी हो सकता है कि गृहमंत्रालय से कुटाई हुई हो,खैर जो भी था। अचानक कोई आवाज उसे रोक देती है , एक पल को वो  रुक कर आगे निकल जाता है पर उस आवाज ने जो कहा उसे  वह सब गूँजता हुआ सा लगता है जैसे  की कोई सुई उसके कान को चोट पहुचाने की कोशिश कर रही हो। एक आवाज शायद कहीं दब रही थी,कुछ था जो कुचला जा रहा था। किसी के वक्ष स्थल,योनि और पूरे शरीर को कोई कसाई की तरह नोच रहा था,वहां सबकुछ खून से लतपथ था। किसी के कौमार्य की नहीं यहाँ किसी के सम्मान की धज्जियाँ उड़ रही थी। शायद कहीं किसी कोने में अगर भगवान होगा तो वो खुद को कोस रहा होगा कि क्यों उसने दुनियाँ बनायीं। उसकी मेमने जैसी आवाज कह रही थी की मुझे बचाओ मुझे बचाओ  शायद उसके साथ कुछ बुरा हो रहा था. हां ये सच था उसके साथ बुरा ही हुआ था किसी ने उसकी इज़्जत लूट ली । और वो साहब जो हम जैसे ही हैं वहाँ से इस सबकुछ को इग्नोर करके चल दिए।

अगले दिन खबर हर अखबार के लिए मसाला थी,जिसने जैसे चाहा घटना का फायदा लिया। धर्म ठेकेदारों ने इसे लड़की द्वारा संस्कृति का हनन बताया तो नेता ने बताया की ये विपक्ष की चाल है। लेकिन एक बात थी आम आदमी अचानक सोशल होकर निकल पड़ा फ़ोटो खिंचाने और झटपट घोषणा हो गयी कि हम  उसके लिये कैंड्ल  यात्रा का आयोजन करके न्याय की गुहार लगाएंगे।अब मजबूरी देखिये कि जिसकी इज़्ज़त लूटी गयी वो हर बार उम्मीद की आवाज लगाती ही है कि शायद कोई कान इसे सुने और इंसानियत का कोई कतरा कभी आकर उसे बचा ले, एक हमारी मजबूरी है की हम किसी की सुन नही सकते क्योंकि हमें आदत हो गयी है जुल्म सह लेने की और उससे भी बड़ी आदत ये हो गयी है कि हम दूसरे के बुरे में ज्यादा दुःखी न होकर थोड़े उत्साहित हो जाते हैं ।एक सबकी साथ मे मजबूरी है की न्याय के लिये आवाज लगाना. . .

क्या हम मजबूरियों मे दबते जा रहे है ? आखिर वो क्या है जो हमारे अंदर  की आवाज को दबा रहा है?. . .

Maneesh bhatt mannu

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