#Lekh by Mukesh Kumar Rishi Verma

राजनीति को सुधरना होगा

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1947 से आज तक भारत को अपनों ने लूटा है, इससे पहले तमाम विदेशिओं ने लूटा | हालांकि हमारा भारत लुटता रहा, पिटता रहा पर हमारी पहचान अमिट रही | परन्तु अब जब अपने ही लूट – लूट कर विदेशी खाते भर रहे हैं तो भारत की पहचान पर संकट के बादल मडराने लगे हैं |

भारत में एक राजनैतिक पार्टी तो ऐसी आई जिसने अपने कान – मुंह बंद करके घोटालों की ऐसी बुलेट ट्रेन दौडाई कि भारतवासी त्राहि – त्राहि कर उठे | इसीसे तंग आकर भारतवासी एक ऐसी राजनैतिक पार्टी चुन कर लाए जिसके माथे पर राष्ट्रभक्ति का लेबल चिपका है | हाथी के दॉत दिखाने के और खाने के और !

भारतवर्ष में अभी एक ऐसा दौर चल रहा है कि गलत को गलत नहीं कह सकते और सही को सही नहीं कह सकते | दिल्ली में बैठा आका रात के बारह बजे कह दे कि सुबह हो गई तो मानलो सुबह हो ही गई अगर आप नहीं मानेंगे तो देशद्रोही हो, गद्दार हो और भी बहुत कुछ… | अभी हालत ये है कि एक मामुली से मजदूर की भी जेब पूरी तरह से साफ की जा चुकी है और बचीखुची की तैयारियॉ चल रही हैं | सरकारी खजाने से पूरी दुनिया का सैर सपाटा संभव नहीं…  हो सकता है इसलिए राष्ट्रभक्ति का रूप देकर नयीं – नयीं लोक लुभावन योजनाओं के विज्ञापन दिये जा रहे हों |

खैर छोडिये और अधिक अंदर जाने की जरूरत नहीं अन्यथा ये लेख भी राष्ट्रद्रोह में सम्मिलित हो जायेगा, भला फिर आगे कैसे लिखा जायेगा ?

बात करते हैं एक प्रतिष्ठित पत्रिका में छपे आर्टिकल की –

अपने देश की सीमाएं पूर्णतः सुरक्षित नहीं हैं | हम युध्द की दृष्टि से कमजोर हैं | हमारे पडौसी देश हमसे अधिक मजबूत हैं, खासकर चीन से मुकाबले के लिए हमें और अधिक शक्तिशाली होने की जरूरत है | अभी हाल ही में प्रधानमंत्री ने एक आकर्षक बयान दिया था कि भारत और चीन के बीच तनाव कितना भी रहता हो, मगर 1962 के बाद से आजतक दोनों देशों के बीच सरहद पर एक भी गोली नहीं चली | यकीनन यह सच्चाई है | एक बड़ी और अत्याधिक आकर्षक सच्चाई है, लेकिन इस सच्चाई के बीच एक बड़ा सच यह भी है कि वर्ष 2017 तक ही चीन की फौजों ने तकरीबन 400 बार से अधिक सीमारेखा का उल्लंघन करते हुए हमारी सरजमीं में घुसपैठ की है | जिन्हें बाद में डरा कर, हाथ पैर जोडकर कैसे भी वापस लौटाया गया है | चीन की ऐसी हरकतों से आम हिन्दुस्तानीयों का खून खौल उठता है | वे सोचते हैं आखिर भारत चीन को सबक कब सिखायेगा | वैसे बता दूं कि सबक कोई गुड़ का पुआ नहीं कि खाने के वास्ते टूट पड़ो | सच्चाई ये भी है कि हम भारतीओं के अंदर देशभक्ती खून में है | खून बहाना हम जानते हैं | पर दस – दस को मारकर खून बहे वही खून रंग दिखाता है और वीरता की श्रेणी में आता है | वरना खून तो रोज सड़कों पर भी बह रहा है | चीनीओं को मारने के लिए हमें शक्तिशाली बनना होगा, आधुनिक बनना होगा क्योंकि चीन पूरी तरह आधुनिक बन चुका है | चीन से जीतने के लिए सर्वप्रथम हमें अपने यहॉ के नेताओं को पहले सबक सिखाने की जरूरत है | आप यकीन मानिये देश की सुरक्षा पर जितना खर्च नहीं होता, उससे कई गुना ज्यादा यहॉ के मंत्रिओं, सांसदों, विधायकों, बाबाओं, उद्योगपतिओं, क्रिकेटरों, फिल्म अभिनेताओं, लालफीताशाही की सुरक्षा, सुख – सुविधाओं में खर्च होता है |

माना जा रहा है कि चीन ने जो प्रगति की है, वो वहॉ की ईमानदार राजनीति की बजह से हुई है |

हमारे देश की प्रगति मंत्रिओं / नेताओं के भाषणों में सरकारी विज्ञापनों में है, अश्लील फिल्मों में है, बिकाऊ अखबारों व टी. व्ही. चैनलों में है | चीन से मुकाबला चीनी वस्तुओं को न खरीदने से नहीं होगा, क्योंकि हमारे यहाँ के खूंसट नेता बडे – बडे सरकारी ठेके तो चीनी कम्पनिओं को दे रहे हैं | चीनी माल पर मेड इन इंडिया का लेबल चिपका कर आम जनमानस की आँखों में धूल झोंक रहे हैं |

समय रहते अपने देश की राजनिति को सुधर जाना चाहिए, अब पूर्ण ईमानदारी से कार्य शुरु कर देना चाहिए | राजनीतिक नेतृत्व को सही निर्णय लेने की क्षमता और लक्ष्य को समय पर हासिल करने के लिए दृढ संकल्प कर लेना चाहिए | अपने अत्यधिक खर्च, अपनी अय्याशी खत्म कर देनी चाहिए | अगर ऐसा नहीं कर सकते तो सिर्फ हम चीन को टेलीविजन के पर्दे पर ही कुछ तथाकथित विद्वानों की ज़ुबानी बमों से ही मात दे सकते हैं, इससे ज्यादा कुछ नहीं…!

 

– मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

गॉव रिहावली, डाक तारौली गुर्जर, फतेहाबाद-आगरा,  – 283111, उ. प्र.

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