#Lekh by P K Hathrasi

” आजाद देश में गुलाम ”

 

मैने जैसे ही अपने मुख से ये बोला कि आजाद देश में गुलाम, तो तुरन्त मुझसे एक सवाल करती हुई आवाज आयी कि इसका क्या मतलब है ‘आजाद देश में गुलाम’ भला ऐसा भी सम्भव है क्या कि देश आजाद होते हुए भी उसमें गुलाम हों ।

मैने उस आवाज को जबाव दिया हाँ जी आजाद देश में गुलाम सही सुना है आपने यही कह रहा हूँ मैं कि देश आजाद होते हुए भी उस देश में लोग गुलाम हैं, वो लोग गुलाम हैं संस्कृति के , वो गुलाम हैं धर्म के, वो जो गुलाम है धार्मिक पाखण्डवाद एवं आडम्बरों के, वो गुलाम हैं समाज में बनाई गई एक व्यवस्था के जो एक तथाकथित विशेष वर्ग ने बनाई है ।

और वो ऐसे गुलाम हैं जो इस गुलामी से निजात पाने में असफल हैं क्योंकि वो डरे हुए हैं धार्मिक, कार्मिक एवं वर्णिक व्यवस्था के ।

अगर ऐसे लोग गुलामी से आजाद होने की तनिक भी सोचते हैं तो अगले ही क्षण उन पर संस्कृति रूपी चावुक मारा जाता है, कस दी जाती हैं जाति रूपी बेड़ियाँ, और थोप दी जाती हैं उनके ऊपर पाखण्डवाद की धाराएँ ।

इनमें से कुछ गुलाम तो यही समझने लगते हैं कि उनका जन्म ही इसीलिए हुआ है और यही सोचकर ऐसी गुलामवादी व्यवस्था को ढोते रहते हैं । व्यवस्था को ढोते – ढोते वो इस तरह मानसिक गुलाम बन जाते हैं कि फिर उनके लिए कितना भी महान मसीहा आ जाए उन्हें आजाद नहीं करा सकता । इस मानसिक गुलामी में वो भूल जाते हैं अपना वो गौरवशाली इतिहास, भूल जाते हैं वो अपनी मूल पहचान और करते रहते हैं उस धर्म रूपी, व्यवस्था रूपी क्रूर शासक की गुलामी, जो उन्हें कीड़े मकोड़े से भी बदत्तर जिन्दगी जीने को प्रेरित करता है ।

वो ये भी भूल जाते हैं कि वो जिस देश में रह रहे हैं वो एक आजाद देश है जिसमें उन्हें अपने अनुसार संवैधानिक तरीके से स्वतन्त्र जिन्दगी जीने का पूर्ण अधिकार है । परन्तु वो उस धर्म व्यवस्था से उपजी मानसिक गुलामी के कारण ” आजाद देश में गुलाम ” बनकर जीते हैं ।

 

इं.पी.के. हाथरसी

मो.नं.- 7417427535 पता – हाथरस (उ.प्र.)

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