#Lekh By Pankaj Prakhar

‘कन्याभ्रूण’ आखिर ये हत्याएँ क्यों?

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बेटा वंश की बेल को आगे बढ़ाएगा,मेरा अंतिम संस्कार कर बुढ़ापे में मेरी सेवा करेगा| यहाँ तक की मृत्यु उपरान्त मेरा श्राद्ध करेगा जिससे मुझे शांति और मोक्ष की प्राप्ति होगी और बेटी, बेटी तो क्या है पराया कूड़ा है जिसे पालते पोसते रहो उसके दहेज की व्यवस्था के लिए अपने को खपाते रहो और अंत में मिलता क्या है ? वो पराये घर चली जाती है| यदि गुणवान है तो ससुराल के साथ निभा लेती है, अन्यथा बुढ़ापे में उसके ससुराल वालों की गालियाँ सुनने को ही मिलती है और कहीं घर छोड़ कर आ गयी तो मरने तक उसे खिलाओ और इसी चिंता में मर जाओ की हमारे बाद उसका क्या होगा |
ये मानसिकता प्रबल रूप से काम करती है आज के समय में कन्याभ्रूण हत्या के पीछे लड़के या लड़की का पैदा होना स्वयं उसके हाथ में तो नही होता और कौन ऐसा होगा जो ये चाहे की उसके उपर मुसीबतों का पहाड़ टूट पढ़े तो ऐसे में हम लड़की को समस्याओं परेशानियों का पुलिंदा और लडकों को कुल का दीपक क्यों समझते है?
ये बात मैं केवल अशिक्षित और गाँव देहात के लोगों के लिए नही कह रहा हूँ बल्कि ये ही हालात पढ़े लिखे समाज में हाई सोसायटी के माने जाने वाले लोगों के भी है |
आखिर क्यों? क्या अपराध है उसका? जिस मासूम ने अभी दुनिया में कदम भी न रखा हो, जिस अबोध की आँखों में संसार का चित्र भी न उभरा हो, उसका भी कोई जानी-दुश्मन हो सकता है? ये प्रश्नवाचक चिह्न अटपटे जरूर हैं, परन्तु वर्तमान समाज की क्रूर व्यवस्था का एक नग्न सत्य है। पितृ सत्तात्मक समाज पुत्र से वंश-बेल को आगे बढ़ाने की सड़ी-गली परम्परा को बदले हुए परिवेश और परिस्थितियों में भी ढोए फिर रहा है। इस रूढ़िग्रस्तता की आसक्ति ही है, जिससे प्रेरित होकर बेकसूर कन्या अपनी भ्रूणावस्था में ही माँ की कोख से जबरदस्ती खींचकर फेंक दी जाती है।
पुराने जमाने के इतिहास-पुराणों में, लोक-कथाओं में ऐसे राक्षस-पिशाचों का जिक्र आता है, जो छोटे बच्चों का मारकर खा जाते थे। बाल हत्यारे इन राक्षसों की कथाओं को सुनने पर हर किसी का मन घृणा से भर जाता है। अपरिपक्व भ्रूण तो बालक से भी मासूम होता है, उसकी हत्या करने वालों को क्या कहा जाए? जो इनके हत्यारे हैं, क्या उनमें सचमुच पिता का प्यार और माता की ममता स्पंदित होती है? यदि ऐसा है तो शायद वे ऐसा क्रूर कर्म कभी न कर पाते।
पुत्र प्राप्ति की प्रबल इच्छा एक मृगतृष्णा ही तो है, आखिर क्या दे रहे हैं पुत्र आज अपने माता-पिता को? इस प्रश्न का उत्तर प्रायः हर घर में लड़कों द्वारा माँ-बाप की जमीन -जायदाद हथियाने के बदले उन्हें दिए जाने वाले शर्मनाक अपमान-तिरस्कार में खोजा जा सकता है। इसे मोहान्धता ही कहेंगे कि रोजमर्रा की ऐसी सैकड़ों-हजारों घटनाओं को देखने के बाद भी पुत्र प्राप्ति की लालसा नहीं मिटती। इस लालसा को मिटाए जाने के बदले कन्या को जन्म लेने के पहिले ही मिटा दिया जाता है। विज्ञान और आधुनिक तकनीकी ज्ञान जैसे- अल्ट्रासाउंड स्केनिंग आदि ने इस क्रूरता को और बढ़ावा दिया है।
इस सबके परिणामस्वरूप वर्तमान समाज में गर्भपात की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई। इन गर्भपातों में बहुलता कन्या शिशुओं की होती है।
अब ये कहा जाए की इसकी रोकथाम के लिए सरकार क्यों कुछ नही करती तो मैं ये कहना चाहूँगा क्या सब काम सकार करेगी हम लोगों में जागृति कब आएगी सरकार हर एक के पीछे तो भाग नही सकती तो क्या होना चाहिए | इसका समाधान बहुत सोचने के बाद मुझे लगा की जो समाजसेवी संस्थाएं है और जो वास्तव में समाज सेवा करना चाहती है| उन्हें जन जागृति के बढे कदम उठाने चाहिए| समाज सेवी संस्थाओं को जिन इलाकों में ज्यादा भ्रूण हत्या होती है उन्हें गोद ले लेना चाहिए और पूरी चौकसी के साथ नजर रखनी चाहिए कि ऐसी एक भी घटना उसके गाँव में न हो सके साथ ही साथ सरकार को भी ऐसी संस्थाएं बनानी चाहिए ,जहां अनचाहे बच्चों को जीवन जीने योग्य वातावरण मिल सके और उन्हें भी समाज में वही सम्मान और अधिकार मिले जो एक सामान्य व्यक्ति के होते है |यदि ऐसा होता है तो परिस्थित्तियाँ एक दम तो नही लकिन धीरे–धीरे बदली जा सकती है|

One thought on “#Lekh By Pankaj Prakhar

  • August 25, 2018 at 7:34 am
    Permalink

    Pankaj ji bahut hi margdarshi or Ac cha Lekh h kanya bhrun hatya Aj Ki hi nhi balki puratan kal Se chali aa rhi ek jwalant Samasya h ya kupratha b kahi jaa skti h Aaj is takniki yug main sonography machine Dwara ling nirdharan bahut hi aasani se ho raha h or kanya bhrun Ka pata chalte hi garbhpat kra k us unchahe garbh

    main hi masom bacchi ki hatya kr Di jati h jisne abhi Maa k garbh SE per Bhi bahar nhi nikala …ye sab bada hi sochniya v shochniya vishay h..is kuriti SE ubarne Ke liye jan jan ko jagruk hona hoga Anyatha ling anupat main gadbadi aage ek bhishan samasya ka roop le sakti h..aprakratik, samlengik sambandh badhenge nirasha or glani Ke bhavo ka pradurbhav hoga..mera to yahi kehna h jab jago tabhi savera h..aaj b jaag jate h to ye kehna anuchit na hoga der aaye durust aaye
    Mujhe Kshama kre mujhe Hindi typing ki jaankari nhi thhi abhi tk Par agli baar main hindi ka hi upyog karoongi.

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