#Lekh By Pragya Varuni Sharma

चाय पर चर्चा
नहीं नहीं, मैं मोदीजी वाली “चाय पर चर्चा” नहीं करने वाली।
यह मेरे घर रोज़ाना में बनने वाली चाय है, जिस पर हम,oops sorry, मैं,चर्चा करने वाली हूँ।
शादी से पहले मुझे पता नहीं था चाय किसी घर में या परिवार में इतना महत्व रखती है। इसका कारण था,हम चारो बहनें चाय नहीं पीती थी। पापा सिर्फ दिन में एक बार शाम को कॉफ़ी पीते थे। बस मम्मी हमारी सुबह नाश्ते के बाद आधा कप चाय पीती हैं। हमारे घर में चाय बिना किसी का सिरदर्द नहीं होता और चाय से ठीक भी नहीं होता।
 बरहाल,चाय बनाना मुझे आता नहीं था। इसी कमज़ोरी को देखते हुए ईश्वर ने मेरी शादी ऐसे घर में की जहाँ चाय के बिना सूरज उगता ही नहीं था।
जितने वैरायटी के प्राणी मेरे ससुराल में उस समय थे उतने प्रकार की चाय बनती थी। ना सिर्फ चाय का स्वाद अलग था हर किसी का चाय का ब्रांड भी अलग था। मेरे लिए यह सब एक अजूबा से कम ना था।
ससुराल में सुबह मुर्गे की बांग से नहीं, गैस चूल्हे पर चाय चढ़ाने के बर्तन की आवाज़ से होती थी। कहने का तात्पर्य,यह है कि चाय चढ़ गयी है, अब उठ जाओ। शादी के बाद पहली बार देखा की बिना चाय पिए कोई हिलता भी नहीं था। हर काम की शुरुआत,”पहले चाय पी लें, फिर करते हैं”, से होती है।
किसी कारणवश, अगर चाय में देर हो जाए तो सिरदर्द शुरु हो जाता है, और चाय पीकर दूर भी हो जाता है। ज़िन्दगी का यह फलसफा, चाय ना पीने वाले कभी नहीं समझ सकते।
हर स्वाद की चाय मेरे ससुराल में बनती है।
हमारे घर के एक सदस्य हैं,जो सिर्फ एक मग(कप नहीं) दूध वाली चाय ,जिसमे चायपत्ती सिर्फ ताजमहल की हो, वो भी बस सूंघने भर के लिए डाली होनी चाहिए,पीती हैं। दो उबाल से ज्यादा वाली चाय, रिजेक्ट हो जाती है।
दुसरे सदस्य को सिर्फ अदरक वाली चाय बारह महीने चाहिए। और चाय पत्ती कड़क वाली। इन महाशय को बाघ बकरी चायपत्ती पसंद है।
तीसरे सदस्य को ना ज्यादा कड़क ना ज्यादा मीठी चाय चाहिए। कहीं वजन ना बढ़ जाए, चीनी कम ही चलेगी।
मेरे स्वर्गीय ससुर को कैसी भी चाय बना के दे दीजिए, कभी मुंह नहीं बिचकाते थे। ठीक 6 बजे मैं चाय लेकर उनके कमरे में जाती और “पापा, चाय” बोलते ही हड़बड़ा के उठ बैठते। मैं उनका अलार्म भी थी।
सासु माँ की चाय अदरक वाली, खूब खौलाई हुई बिना चीनी की होनी चाहिए।
सर्दियों और बारिश के मौसम में, दिन के तीनों वक़्त, खाने से पहले और खाने के बाद, चाय हाज़मे की गोली की तरह पी जाती है।
 रुकिए, अभी एक प्राणी की चाय तो बताना  बाकी रह गया है।
 जी हां, आप सही समझे, मेरे पति परमेश्वर की। पूरे घर की चाय एक तरफ और पतिदेव की एक तरफ। मैं इतने सालों बाद भी इनकी पसंद की चाय नहीं बना पायी। मैं क्या, पूरे खानदान में कोई नहीं बना सकता। यह जैसे ही पहले घूँट चाय का लेते है ,मुंह देखकर समझ आ जाता है, चाय कैसी बनी। अब तो पूछना ही छोड़ दिया है, कि चाय कैसी लगी। जब भी मेरे पति आवाज़ देते हैं,”चाय बना दो” पूरे घर में सब एक दूसरे का चेहरा देखने लगते हैं, फिर सब की नज़रें मेरी तरफ घूम जाती हैं जैसे सबकी नज़रें कह रही हों “गले में घंटी आप ही बांधो”।
अब चुंकि मैं ठहरी अर्धांगनी, चाय मुझे ही बनानी पड़ती है। गम इस बात का है आज तक पसंद की चाय नहीं बना पायी।
छुट्टी का दिन “चाय दिवस” के रूप में हमारे घर में मनाया जाता है। दिन भर चाय की फरमाइश होती है। यही पतिदेव दिन में 5 कप चाय पी जाते हैं, फिर भी कहेंगे, यह कैसी चाय बनायीं है?
कहते हैं, वक़्त हमेशा एक सा नहीं रहता।
घर की बहू से अब मैं घर की मालकिन हूँ।
इस लिए दूसरे से तीसरे चाय के कप की फरमाइश मैं अपने एक कान से सुन, दूसरे कान से निकाल देती हूँ। पतिदेव भी तीसरे कप की डिमांड मेरा मूड देख कर ही करते हैं।
अब तो यह हाल है कि घर आये मेहमान को बिना पूछे कॉफ़ी ही पेश कर देती हूँ।(इसका मतलब यह नहीं कि मैं अच्छी मेहमाननवाज़ी नहीं करती)
बस चाय को लेकर थोड़ा त्रस्त हूँ।
चलिये, मेरी यह चाय की चिकलस तो चलती रहेगी। आप अपनी टेबल पर रखी चाय के मज़े लें।
वैसे, मेरी इस चर्चा का शीर्षक “चाय पर चिकलस” कैसा रहेगा??
प्रज्ञा वारुणी शर्मा
भोपाल
942508250

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