#Lekh by Preeti Praveen

आलेख:-

‍बालदिवस पर अशेष मंगलकामनाएँ‍

 

”देश के भावी कर्णधारों के खोते बचपन को बचाना हमारी महती ज़िम्मेदारी है”

बच्चों के लिए साहित्य रचना उतना आसान नहीं है,जितना लोग समझते हैं।एक बाल साहित्यकार  को बाल साहित्य रचने के लिए परकाया प्रवेश करना पड़ता है,बच्चे के मनोविज्ञान को समझना पड़ता है,उसकी अभिरुचियों का संज्ञान होना,भाषा शैली पर विचार करना बहुत आवश्यक होता है।इसके अलावा किस आयू वर्ग के लिए लिखा जा रहा है,उससे सम्बंधित विषयों के चयन को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है।

जब हम बहुत छोटे बच्चों के लिए लिखते हैं उसमें चित्ररात्मकता,गेयता,सहजता-सरलता,छोटे विन्यास आदि बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

बच्चों को उपदेश दिया जाए,ये उनको पसंद नहीं।हमें सीधे-सीधे उपदेश न देखकर उदाहरण के रूप में बताने का प्रयास करना चाहिए।हमें बच्चे की जिज्ञासा और प्रश्नाकुलता को ज़ेहन में रखकर लिखना होगा।

बच्चों में साहित्य का संस्कार,नैतिक मूल्यों का ज्ञान घर-परिवार से रोपित करने का प्रयास करना चाहिए।प्रथम गुरु के रूप में उसका सामना सबसे पहले माँ तथा घर के अन्य सदस्यों से होता है।बच्चे का स्वभाव अनुकरण करने वाला होता  है,उसपर परिवार के आचार-विचार का प्रभाव सबसे पहले पड़ता है।एक कुम्हार जिस प्रकार कच्ची मिट्टी को भलीभाँति पकाकर बर्तन बनाने के लिए तैयार करता है,ठीक उसी पर अभिभावक,शिक्षक,समाज को जुटना होगा।

आज कल कई साहित्यकार बाल साहित्य के नाम पर बच्चों के लिए कुछ भी लिख कर उसे बाल साहित्य में खपाना चाहते हैं,और खपा भी रहे हैं।इस ओर भी ध्यान देना होगा।

दरसल बाल साहित्य एवं साहित्यकारों को आज भी वो मुक़ाम हासिल नहीं है जो अन्य साहित्य एवं साहित्यकारों को है।बाल साहित्यकार को हीन दृष्टि से देखा जाता है।कई बड़े साहित्यकार बाल साहित्य लिखने से कतराते हैं।बाल सहित को दोयम दरज़े का साहित्य माना जाता है।ऐसा नहीं है की सभी साहित्यकार ऐसा कर रहे हैं।कई बाल साहित्यकार सार्थक स्रजन कर रहे हैं वो पसंद भी किया जा रहा है,लेकिन उनकी संख्या काफ़ी कम है।

अंग्रेज़ी के प्रभाव से भी हिंदी बाल साहित्य को जूझना पड़ रहा है।मल्टीमीडिया के सुखद परिणाम हैं तो वहीं दुशप्रभाव भी हैं।कहते हैं कि”अति सर्वत्र वर्जिते”,किसी भी चीज़ की अधिकता बुरी होती है।रोटी की जद्दोजहद में हम बच्चों को ध्यान नहीं दे पा रहे हैं,उस पर एकल परिवार के कारण बच्चा या तो काम वाली बाई के साथ रहने को विवश है!!उससे संसकार और नैतिक मूल्य क्या सीखेगा!!हम महँगे उपकरण तो ला देते हैं,उन गैजेट्स में बच्चा न देखने वाली चीज़ें भी देख रहा है,इस प्रकार बचपन खोता बच्चा असमय बड़ा हो रहा है।आज दादी नानी की कहानी से संस्कार और नैतिक मूल्य का संज्ञान बच्चों को नहीं मिल पा रहा है।

समय के साथ क़दमताल बिठाते हुए हमें लेखन में भी परिवर्तन करना होगा।आज के बच्चे की पसंद ना पसंद को ध्यान में रखते हुए लिखना होगा।आज बच्चा काल्पनिक दुनियाँ से ऊपर उठ गया है,उसे प्रैक्टिकल करके दिखाना होगा।पुरानी चीज़ों को नए संदर्भों में प्रस्तुत करना होगा।

आज मशीनी युग में संवेदनाएँ ख़तम होती जा रहीं हैं,उस पर ध्यान देना होगा।हमें कथनी और करनी के अंतर को समझना होगा।हम चाहते हैं कि हमारा बच्चा सुसंस्कारी बने तो हमें भी उन संस्कारों को अपनाना होगा।हम स्वयं जड़ों से दूर हो रहे हैं तो बच्चों को कैसे जोड़ेंगे??जो बच्चा देखेगा वही तो अनुसरण करेगा।हमें बच्चे के कोमल मन को समझना होगा।

बच्चों तक साहित्य पहुँचाने के लिए घर में नियमित बाल पत्रिकाओं को मंगवाना,तथा बचपन से पढ़ने के प्रति रुचि विकसित करना होगा।अभिभावक,शिक्षक बाल साहित्यकार,राजनेता एवं समाज आदि सभी को साथ मिलकर प्रयास करना होगा।हम भविष्य की चिंता में वर्तमान को नज़रअन्दाज़ कर रहे हैं,जबकि वर्तमान के बच्चे ही तो भविष्य के कर्णधार बनेंगे।अंत में एक शायर की पंक्तियों से बात ख़तम करूँगी…..

”खेलता है खिलौने से हरदम

तिफ़्ल के दिल की सादगी क्या है….!”

डॉ.प्रीति प्रवीण खरे

भोपाल म.प्र

 

 

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