#Lekh By Ramesh Raj

‘ तेवरी ‘ ग़ज़ल नहीं है क्योंकि —

‘ वृहद हिंदी शब्दकोश ‘ [ सम्पादक- कालिका प्रसाद ] के षष्टम संस्करण जनवरी – १९८९ के पृष्ठ -४९० और ४९३ पर तेवर [ पु . ] शब्द का अर्थ – ‘ क्रोधसूचक भ्रूभंग ‘, ‘ क्रोध-भरी दृष्टि ‘ , ‘ क्रोध प्रकट करने वाली तिरछी नज़र ‘ बताने के साथ-साथ ‘ तेवर बदलने ‘ को – ‘ क्रुद्ध होना ‘ बताया गया है | ‘ तेवरी ‘ [स्त्री. ] शब्द ‘ त्यौरी ‘ से बना है | त्यौरी या ‘ तेवरी ‘ का अर्थ है – ‘ माथे पर बल पड़ना ‘ , ‘ क्रोध से भ्रकुटि का ऊपर की और खिंच जाना ‘ |

उपरोक्त तेवरी की परिभाषा से स्पष्ट है कि ग़ज़ल के आत्मरूप-प्रणय निवेदन अर्थात “प्रेमिका से प्रेमपूर्ण बातचीत” से तेवरी बिल्कुल भिन्न है।तेवरी के आक्रोश, असंतोष से भरे भावों-अनुभावों में ग़ज़ल की तलाश इसलिए अनावश्यक है क्योंकि जिस प्रकार एक जैसी शारीरिक संरचना होने के बावजूद भिन्न-भिन्न चरित्रों वाली औरतों को, केवल औरत न मान कर मालकिन-नौकरानी, डायन-मंगला, देवी-कुलटा, नगरवधू –कुलवधू रानी-दासी, मां-बेटी, बहिन-पुत्री कहा-पुकारा जाता है, ठीक इसी प्रकार का अन्तर तेवरी और ग़ज़ल में है।
एक जैसे शरीर वाले दो व्यक्तियों के असमान व्यवहार हों तो एक को निकृष्ट प्रवृत्तियों के कारण ‘नीच’ तो दूसरे को सात्विक-श्रेष्ठ नैतिक और सौम्य व्यवहार के कारण ‘संत’ या ‘देव-पुरुष’ माना जाता है।

विचारणीय यह भी है कि क्या किसी गुण्डे या समाजसेवी के आँख-नाक-हाथ-पैर-मुँह के बीच कोई भिन्नता होती है? आँख-नाक-हाथ-पैर-मुँह तो दोनों के समान होते हैं, असमानता तो उनके व्यवहार के कारण होती है जिसके आधार पर एक को गुण्डा तो दूसरे को समाज-सेवी कहा जाता है। अतः ग़ज़ल और तेवरी के शिल्प में ग़ज़लकारों को यदि किसी समानता के दर्शन होते भी हैं तो इसके आधार पर क्या तेवरी को ग़ज़ल कहा जा सकता है?

यदि किसी के हाथों में प्याला या शराब की बोतल लगी हो और किसी दूसरे व्यक्ति के हाथ में तलवार लहरा रही हो तो क्या, इन दोनों व्यक्तियों की केवल हाथ की समानता को लेकर कोई मूल्यांकन किया जा सकता है? नहीं। वस्तुतः मूल्यांकन का आधार तो तलवार और बोतल बनेंगे!

मिन्नत की अवस्था में जुड़े हाथ और क्रोध की अवस्था में मुट्ठी भिंचे हाथ की क्रिया एक समान कैसे हो सकती है?

सच तो यही है कि कथ्य || विचार || बदलते ही शिल्प || शरीर || में अपने आप आमूलचूल परिवर्तन आ जाता है | तेवरी के शिल्प को ग़ज़ल का शिल्प बताने वाले ग़ज़लकारों को इस प्रश्न का उत्तर भी पूरी विवेकशीलता से देना चाहिये कि क्या अनीति अत्याचार के विरुद्ध आक्रोशित आँखों की लाली और विरहवेदना में जलती आंखों की लाली का आकलन एक समान हो सकता है?

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