#Lekh by Ramesh Raj

तेवरी- व्यवस्था-परिवर्तन की माँग

+चरनसिंह ‘अमी’
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परिवर्तन प्रक्रिया के लिए मुख्यतः तत्कालीन परिवेश, माँग, परम्परा, मूल्य, अधिक जिम्मेदार होते हैं। साहित्य के संदर्भ में कहें तो जब भी अभिव्यक्ति, समाजगत-आदमीगत नये आयाम तलाशती है, वह पिछला पूरी तरह खंडित तो नहीं करती किन्तु बहुत हद तक उसे स्वीकारने में हिचकिचाती जरूर है। यह निर्विवाद रूप से स्वीकार्य होना चाहिए कि अभिव्यक्ति इस प्रचलित रूप में संकुचित होती जा रही है, समुचित रूप से अपनी बात नहीं कह पा रही है। या यूँ कहें कि कब उसको नये अर्थ-संदर्भ या मूल्य को अभिव्यक्ति देने में वर्तमान प्रचलित रूप असमर्थ है। बहरहाल यहीं से परिवर्तन की माँग उठने लगती है, जो निरंतर तेवरी को स्थापना की ओर अग्रसर करती है।
ग़ज़ल का अपना एक कोण रहा है। वह दायरों में बँधी रहे, आवश्यक नहीं है। किसी भी विधा के लिए यह जरूरी शर्त भी है कि वह दायरा तोड़े। किन्तु ग़ज़ल को दायरे में बाँधकर रखा जाना ही श्रेयस्कर साबित नहीं हुआ। हालांकि उसकी छटपटाहट महसूस की जाती रही। प्रेमी-प्रेमिका को साँसों के दरम्यान टकराने वाली ग़ज़ल, प्रेमिका के जूड़े में गुलाब की तरह खुँसती रही। किन्तु जब वह वहीं उलझकर रह गयी तो उसे किसी ने भी बाहर निकालने की कोशिश नहीं की। ऐसे में गुलाब की जगह यदि ‘तेवरी’ ने आकर क्लिम्प खोंस दिया तो इसमें जूड़े की सुन्दरता घट तो गई? क्या जूड़े को और अधिक सुहढ़ता नहीं मिली? कभी-कभार यह पिन सिर के भागों में चुभ भी गयी तो यह क्षम्य होना चाहिए |
यदि तेवरी को अतिक्रमणकारी प्रवत्ति में देखे तो उसके सन्दर्भ में तमाम बातें वाजिब ठहरती हैं। तेवरी की इसी जुर्रतबाजी के कारण ही ग़ज़ल के कुछ हिमायतदार तेवरी को इतने सीधे स्वीकार नहीं कर रहे हैं। दूसरी ओर इतनी क्षमता वे स्वयं मैं पैदा भी नहीं कर पाये हैं।
तेवरी के अपने निजी तेवर हैं, अपनी बौखलाहट है। आज बौखलाया-टूटा हुआ आदमी यदि अचानक मुँहफट हो जाए, मारने के लिए ईंट उठा ले, अधिकारों के लिए सीधे-सीधे गालीगलौज पर उतारू हो जाए और चीखे तो इसमें ग़ज़लकारों को तेवरीकारों को गरियाने की जरूरत क्या है? ग़ज़ल के हिमायती यह क्यों देखते हैं कि तेवरीकार क्या चिल्ला रहा है? वे यह क्यों नहीं देखते हैं कि वह क्यों चिल्ला रहा है?

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