#Lekh by Rekha Maurya

!! श्रृंगास तुम बिन अधूरा !!

# तुम्हारी याद की मनोहर कल्पना #

सुनो पिया मैं हर रोज सुबह सुबह दर्पण में संवरती तो हूँ ,,,पर न जाने क्यों मेरे और इस दर्पण की पारदर्शिता में एक धुंध सी छायी रहती है ।।

मैं कभी भी पूर्णयता अपने आप को संवरी हुयी नही पाती हूँ ,,,और न ही खुद से तुलना कर पाती हूँ ।।

मुझे आज भी वो आपकी दिल को प्रेमराग से सुगन्धित कर देने वाली बात याद आती है,, और आँख़े भी नम कर जाती है,,,मेरा रोम रोम यही सोचता हैं ,,,की आप होते तो ऐसा कहते आप होते तो वैसा कहते ।।

लेक़िन मैं उदास होकर अपने श्रृंगार को अधूरा नही छोडूँगी ।।

आप जब पास में थे,,,, तब यही कहते की मेरे मन के दर्पण में अपनी एक झलक को देखो तो तुम संसार की सबसे सुन्दर और निखरती हुयी नव कपोल कली की तरह अपने यौवन को देखती रह जाओगी।।

आप मुझसे कहते भी थे की तुम क्यों सजती सवरती हो,,,

।। मुझे तुम ऐसे ही सबसे सुंदर लगती हो ।।

 

आप की बात तो ठीक है लेक़िन मैं भी देखना चाहती हूँ ,की आप के मन में मेरी छवि या मेरे मन में आप के लिए ये सारा श्रृंगार में से कौन आप को ज्यादा मनमोहक लगता है ,,,, बस यही सुबह सुबह एक कल्पना मेरी मुझे ये सोचने पर मजबूर कर देती है  ।।

#जब मैं ललाट पर बिन्दी लगाने जाती हूँ अनायास आप की कही हुयी बात याद आ जाती है ।।

जब आप पास में थे तब यही कहते की ,,,ये छोटी सी बिन्दी तुम्हारे माथ पर बिल्कुल लाल शून्य की भाँति तुम्हारे ललाट की लालिमा को फ़ीका कर रही है,,,,,

तुम मेरे मन के दर्पण में एक बार झाँक कर देखों तो सम्पूर्ण रवि और उसकी सारे प्रभातमयी प्रकाश की बिन्दी ही अपनी ललाट पर सजी हुयी चमकती पाओगी,, !! क्या तुम देखना चाहोगी !!

।। मुझे तुम ऐसे ही सबसे सुंदर लगती हो ।।

 

जब मैं आँखों में काजल लगाने जाती हूँ फिर से आप की कही हुयी बात याद आ जाती है आप जब पास में थे तब यही कहते थे,,,,की ये काला काजल तुम्हारे आँखों में एक काली रेखा की भाँति तुम्हारी मृगनयनी आँखों की सारी बनावट को ध्वस्त कर रहा है,,,।।

तुम मेरे मन के दर्पण में एक बार अपनी इन आँखों की रचना की बनावट में काजल ढ़लते हुए देखों तो ,,,सारे अन्धकार को समेट कर बनी विशालकाय आँखो ही

जिसमें सारी संसार की असीत (कालिमा) समा जाये ऐसी ही पाओगी ,,, !! क्या तुम देखना चाहोगी !!

।। मुझे तुम ऐसे ही सबसे सुंदर लगती हो ।।

 

जब मैं अपने रद- पद (होंठ) पर लाली लगाने जाती हूँ,,,एक बार फिर आप की कही हुयी बात बार – बार मेरे मस्तिष्क में उथल पुथल पैदा करती है ।। और मेरे मस्तिष्क रुपी दिल के द्वार पर दस्तक़ देती है ,,,,

की तुम्हारे अधरों की लाली बरसात में क्षणिक इंद्रधनुष जैसे अपने लाल रंग के प्रकाश को जैसे छोड़ता है वैसे ही नज़र आ रही है ।।

तुम मेरे मन के दर्पण में एक बार अपनी इन रद-पद की अरुणिमा को देखो तो सम्पूर्ण संसार के लाल गुलाबो को एक साथ धरती पर बिछा दो जँहा तक हो सके अनन्त छोर तक सिर्फ़ और सिर्फ़ ग़ुलाब दिखे,,,, ये कल्पना मात्र नही है हक़ीक़त है ,,,

!! क्या तुम देखना चाहोगी !!

।। मुझे तुम ऐसे ही सबसे सुंदर लगती हो ।।

 

जब मैं माँग में सिंदूर को भरने जाती हूँ ,,,, यादो के रूप में महकती वही बात जो आप के द्वारा कही गयी थी,,, मेरे मन में आहट करती हुयी उत्पन होती है और मुझे याद आने लगता है ,,,उन शब्दों को वाक्यों में गुथना और एक प्रेम की माला का बनाते जाना ।।

की तुम्हारे माँग में लगा ये सिन्दूर मुझे केवल एक लाल माटी के ढेले को पीस कर लगाया गया चूर्ण लगता है,,

ये तुम्हारे श्रृगाऱ के सर्वोपरि सर के मुकुट की शोभा को तुछ बना रहा है ,,,

तुम मेरे मन के दर्पण में एक बार अपनी माँग में भरे सिन्दूर को देखो तो मेरे सारे शरीर का एक एक कटरा लहु का एकत्रित करके उसे प्रशांत महासागर में प्रवाहित करने के बाद जो लाल द्रश्य तुम देखोगी वैसा ही तुम्हारी माँग में सिन्दूर को मेरे हाँथो से सजाया हुआ पाओगी ,,, !! क्या तुम देखना चाहोगी !!

।। मुझे तुम ऐसे ही सबसे सुन्दर लगती हो ।।

 

“मेरी और तुम्हारी रूह के मिलन की आभा कितनी सौन्दर्य और तेजस्वी है,,, जैसे सम्पूर्ण ब्रह्मांड हर्षित होकर  राग , अनुराग की तरह अपनी ख्याति से सबको चकाचौंध कर रही हो ,,ऐसी आभा (चमक) को ज्योतिमान करने में तुम्हारी भी भागीदारी है ।।

तो फ़िर तुम खुद सोचो तुमको ये दिखावटी श्रृंगार मेरे लिए करना क्या शोभनीय है ,,, तुम्हारे बिना ये शुद्ध , निर्मल ,  आभा क्या पूरी होती । ” नहीं कभी नही “।।

मैं तुम्हारे इस श्रेय के लिए हमेशा आभारी रहूँगा,,,

।। मुझे पूरा करने के लिए मेरी प्राणप्रिय ।।

 

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