#Lekh by Swayambhu Shalabh

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर आज देशभर में आयोजित हो रहे विभिन्न कार्यक्रमों के बीच चलिये आज इसी विषय पर कुछ चर्चा करें…

आज के बदलते दौर में जहां पुरुष और नारी के बीच समानता और बराबरी को लेकर तमाम बहस किये जाते हैं। बड़े बड़े मंच से नारी सशक्तिकरण की वकालत की जाती है। देश भर में बालिकाओं की शिक्षा को लेकर सरकार की विभिन्न योजनाएं भी चल रही हैं लेकिन यह असमानता भी अपनी जगह बदस्तूर कायम है। हर बार जब किसी क्षेत्र में कोई लड़की कामयाबी हासिल करती है तो जोरशोर से उसका प्रचार होता है उसकी मिसाल दी जाने लगती है और नए सिरे से नारी सशक्तिकरण की चर्चा शुरू हो जाती है।
उस खास लड़की की सराहना में तारीफों के पुल बांधते समय हमें अपने आसपास भी नजर डालना चाहिए और सोचना चाहिए कि सामाजिक परिवेश के खिलाफ अपने आत्मविश्वास और जिद के बदौलत कितनी लड़कियां अपनी पहचान बना पाती हैं।
लड़कियों की उच्च शिक्षा को लेकर चिंता किया जाना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि समाज का एक बड़ा हिस्सा आज भी लड़कियों के लिए उच्च शिक्षा को गैरजरूरी समझता है।
देश के अनेक ग्रामीण अविकसित और आदिवासी इलाकों में आज भी लड़कियां चूल्हे चौके और बच्चे पालने के अलावा कुछ नहीं जानतीं। बाल विवाह आज भी बदस्तूर जारी है।

इस विषय में मैं अपने कुछ अनुभव आप सबों के समक्ष रखता हूँ…

भारत नेपाल का सीमाई शहर रक्सौल और वीरगंज जो मूल रूप से मेरा कार्य क्षेत्र रहा वहां छात्राओं को उच्च शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करने की मुहिम की शुरुआत मैंने करीब 10 साल पहले की थी। जिस शिक्षण संस्थान में मैं लंबे समय से  कार्यरत रहा हूँ वहां यह कार्य करना आसान तो था लेकिन अभिभावकों के बीच जाने के बाद एक बेहद निराशाजनक तश्वीर सामने आई। अपने प्रयासों के दौरान मैंने पाया कि बच्चों से अधिक उनके अभिभावकों को कॉन्सेलिंग की आवश्यकता है। लड़कियां तो आगे पढ़ना, आगे बढ़ना और अच्छा कैरियर बनाना चाहती ही हैं लेकिन अधिकतर मां बाप की मंशा यह है कि इंटर कर लिया या अधिक से अधिक ग्रेजुएशन में आ गई तो शादी कर दो। इनमें ज्यादातर ऐसे मां बाप हैं जो आर्थिक दृष्टि से काफी संपन्न हैं। उनकी यह सोच है कि ज्यादा पढ़ा लिखा देंगे तो लड़का मिलने में दिक्कत हो जायेगी। कुछ काफी संपन्न मां बाप का यह भी मत रहा कि उच्च शिक्षा में फिर आठ दस लाख लगा भी दें तो भी लड़का वाला दहेज में कमी नहीं करेगा। कुछ अपना अनुभव बताते कि बाहर की पढ़ाई कराने में पैसा बेकार गया, शादी में खर्चा कम नहीं हुआ। लड़का खोजने में जान निकल गई…

बदलते हुए परिवेश में शिक्षा के महत्व और उससे बच्चों में आनेवाले आत्मविश्वास के बारे में मैं समझाने की कोशिश करता रहा हूँ जिससे कई अभिभावक सहमत भी हुए और बेटियों को बाहर भेजा। आज कई लड़कियां अच्छे कॉलेजों से इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट और अन्य क्षेत्रों में ऊँची डिग्री हासिल कर बड़ी कम्पनियों में सर्विस कर रही हैं और अपने परिवार और समाज का नाम रौशन कर रही हैं।

इस मामले में एक यह पहलू भी सामने आया कि यदि कोई लड़की ज्यादा पढ़लिख कर कैरियर में ऊँचा स्थान बना लेती है तो भी परेशानी बढ़ जाती है क्योंकि तब उस लायक वर मिलना कठिन हो जाता है। जितने भी मैट्रिमोनियल साइट्स हैं उनमें बड़े प्रोफाइल के साथ अच्छे विकल्प का अभाव नजर आता है। इस समस्या से मेरे कई परिचित  जूझ भी रहे हैं।

उच्च शिक्षा का वातावरण तैयार करने के लिए एक बड़े मुहिम की आवश्यकता है। हर क्षेत्र में इंटर या +2 स्कूलों में संपर्क करके पास करने वाली छात्राओं की लिस्ट बनाई जाय और तब उनके अभिभावक से संपर्क कर उनका कॉन्सेलिंग किया जाय।
शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोग जो इस कार्य में मदद कर सकते हों उन्हें भी टीम में जोड़कर उनका व्हाट्सऐप नं सार्वजनिक रूप से प्रकाशित किया जाय ताकि कोई भी अभिभावक शिक्षा और कैरियर संबंधी अपनी शंका का समाधान कर सके।
छात्र छात्राओं की रूचि के हिसाब से उन्हें अच्छे कॉलेजों की जानकारी देने के साथ एडमिशन की प्रक्रिया को समझाया जाय। उनके मार्क्स और मेरिट के आधार पर अच्छे कॉलेज में एडमिशन में  मदद भी उपलब्ध कराई जा सकती है।

शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोग अपनी जानकारी और संपर्क का लाभ उन तक पहुंचा सकते हैं। छात्रा, अभिभावक और एक्सपर्ट के बीच समन्वय स्थापित कर  इस योजना को मूर्त रूप दिया जा सकता है। समाजसेवी संगठन भी इस कार्य में प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं।

मेरा मानना है…नारों और भाषणों से बदलाव नहीं होता। बदलाव के लिए जमीन पर ईमानदार पहल की आवश्यकता होती है। हम आप इस दिशा में आगे आएं…कड़ी से कड़ी जुड़ती जायेगी… कारवाँ बनता जायेगा…और तभी वास्तव में बेटियों को वह स्थान मिलेगा जिसकी वो हकदार हैं…

– डा. स्वयंभू शलभ

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