#Lekh by Swayambhu Shalabh

निर्भया से आसिफा तक…

बीते 6 वर्षों में देश में बहुत कुछ बदला लेकिन लड़कियों के लिए असुरक्षा का वातावरण नहीं बदला।
कहते हैं एक नारी को बेटी, बहन, पत्नी और मां के रूप में सृष्टि का अद्भुत वरदान प्राप्त है। इस देश में मातृशक्ति के रूप में नारी की पूजा की जाती है। जिस मिट्टी में हमने जन्म लिया वह भारत माता कहलाती है। माता पिता के समस्त संचित पुण्यकर्मों के फल के रूप में घर में बेटी का जन्म होता है….
ऐसी मान्यताओं के बीच बेटी का जन्म या उसके सम्मान के साथ किसी भी प्रकार का खिलवाड़ यह संकेत देता है कि हम पतन के गर्त्त में जा रहे हैं और जिस समाज में हम जी रहे हैं वह संवेदनहीन लोगों की भीड़ मात्र है।
देश भर में हर रोज हो रही कन्या भ्रूण हत्या के आंकड़े हमें भयभीत भी करते हैं और शर्मशार भी।
सरकार ने भ्रूण पहचान करने वाले लैब एवं क्लिनिकों पर पाबंदी लगाई परन्तु परदे के पीछे यह व्यापार बेरोकटोक जारी है। मेडिकल साइंस का यह दुरूपयोग छोटे बड़े सभी जगहों पर दिखाई देता है। यहां बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल कानून बना देने से ऐसी घटनाओं पर रोक लगेगी…
2012 की निर्भया गैंगरेप की दिल दहला देनेवाली घटना को हम शायद ही कभी भूल पाएं। दिल्ली की उस वारदात ने पूरे देश को झकझोर दिया था। देश के हर हिस्से में इस घटना को लेकर गुस्सा देखने को मिला। लोग सड़क पर उतरे। अपने अपने तरीके से अपना दुःख और आक्रोश व्यक्त किया और उस लड़की की सलामती की दुआएं मांगी। थोड़े दिनों के लिए उस लड़की का दर्द मानो हरेक देशवासी का दर्द बन गया। लगा कि इस देश में अब लड़कियों के लिए असुरक्षा का वातावरण खत्म हो जाएगा। लेकिन कुछ नहीं बदला।
इस घटना के साथ भी हम सबों ने इतना जुड़ाव इसलिए महसूस किया क्योंकि यह खबर लगातार सोशल मीडिया और न्यूज चैनलों की सुर्खियों में छायी रही।
ऐसी कितनी ही घटनाएं हर रोज देश के विभिन्न हिस्सों में घटित होती हैं जो इसकदर चर्चा में नहीं आतीं, जिनकी खबर नहीं बनती लेकिन यह आंकड़े भयभीत करते हैं।
छेड़छाड़, जबरदस्ती, घरेलू हिंसा और बलात्कार के अधिकांश मामले लोकलाज और समाज के भय के कारण दबा दिए जाते हैं। हमारा सामाजिक परिवेश और कानून व्यवस्था के प्रति अविश्वास ऐसी घटनाओं को चुपचाप सहन करने के लिए मजबूर कर देता है।
6 साल बाद आसिफा को लेकर एक बार फिर वही शोरशराबा है। इस बार यह जघन्य घटना एक मासूम बच्ची के साथ हुई जिसे जाति, बिरादरी और धर्म में फर्क तक नहीं पता। टीवी के हर न्यूज़ चैनल पर लोग बहस में उलझे हैं। कुछ लोग गुनहगारों को बचाने के लिए शोर कर रहे हैं तो कुछ लोग उस मासूम के लिए इंसाफ मांग रहे हैं। लेकिन यह सब कुछ दिन की बात है। कुछ दिनों में कोई दूसरी सनसनीखेज खबर आएगी और ये तमाम लोग किसी नई बहस में उलझे नजर आएंगे।
दो हफ्ते तक जिंदगी से जंग लड़ने के बाद निर्भया की मौत हो गई थी। आसिफा को निर्मम तरीके से मार दिया गया।
ऐसी मौत किसी एक बेबस इंसान की मौत नहीं बल्कि व्यवस्था पर देश के भरोसे और विश्वास की मौत होती है। सभ्य समाज में जीने का दावा करनेवाले हरेक इंसान की मौत होती है। मानवता को तार तार करने वाली ऐसी घटनायें सरकार और पुलिस प्रशासन के साथ समाज को भी कठघरे में खड़ा करती हैं।
जब तक देश के किसी भी कोने में किसी भी बेटी के सामने भय का यह साया बना रहेगा तब तक हम एक सभ्य समाज में जीने का दावा नहीं कर सकते।
प्रताड़ना से जुड़े ऐसे अपराधों के लिए सख्त कानून बनाये जाने, नाबालिग के साथ दुष्कर्म पर फांसी की सजा का प्रावधान किये जाने, फास्ट ट्रैक कोर्ट की संख्या बढ़ाकर पीड़िता को शीघ्र न्याय और अपराधी को सजा दिलाये जाने, ऐसे मामलों की सुनवाई महिला जज द्वारा कराये जाने, पीड़ित महिला के बयान के एफिडेविट को प्रामाणिक सबूत मानकर क्रास एग्जामिनेशन की प्रक्रिया को खत्म करने और ऐसी घटनाओं में संलिप्त व्यक्तियों की पहचान सार्वजनिक किये जाने की दिशा में कुछ कदम तो सरकार ने उठाये लेकिन बहुत कुछ है जो करना बाकी है। और वह सबकुछ समाज के लोगों को मिलकर करना होगा…

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