#Lekh by Vishal Shukla

प्रसंगवश

हमारा प्यारा लोकतंत्र

छोटी संख्या जब बड़ी संख्या पर प्रहार करती है तो समझिए वो नालायको का ही उद्धार करती है इतिहास गवाह है कि जब मुगल अल्पसंख्यक के रूप में आये तो हिंदुओं और सनातन संस्कृतिक का बड़ी मात्रा में दोहन किया गया उसके बाद अंग्रेज आये तो देश को गुलामी और बंटवारा की त्रासदी मिलीे और आगे बढ़े तो हमारी पूर्व सरकारों द्वारा केवल वोटो की संख्या के लिए जारी आरक्षण से देश की प्रतिभाओं का अंतिम संस्कार होने लगा हद तो तब हो गयी जब इस लोकतंत्र यानी भीड़ तंत्र में केवल संख्या के आधार पर लक्ष्य पूर्ति सत्ता का मुख्य आधार बन गयी! जरा सोचिये दो बदमाश आपको दिखाने के लिए लड़ाई करें और फिर बाद में  स्वार्थवश एक हो जाए तो क्या आपको लगता है वो संख्या में अधिक है इसीलिए सही है और जो कम है तो गलत ! किसी विद्वान ने लिखा था कि जरूरी नही भीड़ सही हो ? यह आज सही साबित हो रही है दरअसल हमारा लोकतंत्र भीड़तंत्र में परिवर्तित हो गया हैयही कारण है कि आज अपराधी गवाह के अभाव में गंगा स्नान कर कर रहे है और विभिन्न राजनैतिक दल अल्पमत होते हुए भी बहुमत पा रहे है जिसका खमियाजा आने वाली पीढ़ी को नही बल्कि हमें ही भुगतना होगा!

विशाल शुक्ल

 

 

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