#Lok Geet by Gayaprasad Morya Rajat

लोकगीत

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आये बदरा न एकहु बार सखी री झूला कैसें झुलूँ।

भूली भूली मैं तो गान मल्हार सखी री झूला कैसें झुलूँ।

 

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भूलि गयौ निर्मोही मेरौ अँगना भूलि गयौ।

आस  बधों हाथन में मेरौ कंगना तोरि गयौ।

धुक धुक जियरा धडकै पड़ै   न एक फुहार

सखी री झूला कैसें झुलूँ।

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सीमा पै मेरौ भइया तपि रहियौ घर मे तपि रहि भाभी।

तोपन की गर्जन तैं बीरन कांपि रही है घाटी।

भइया के संग रन में जाइकें लेलूँ हाथ कटार।

सखी री झूला कैसें झुलूँ आये बदरा न एकहु बार।

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आय रह्यो जी राखी बंधन सुधि भइया की आबै।

बैरी मेरे देश की सीमा फिर फिर घुसि घुसि आबै।

बार बार की चिक चिक जाबै गर्दन मोड़ो जाई बार

सखी री झूला कैसें झुलूँ —

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खाय रहियो गुर्राय रहियो है मेरौ चीनी भइया।

भूलि जाऊ जा चीनी माल कूँ याद आए जाय मइया।

ऐंठी ऐंठी कैं कान चीन के धौंस हु देउ निकार।

सखी री झूला कैसें झुलूँ आये बदरा न एकहु बार।

गयाप्रसाद मौर्य रजत आगरा

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