0210 – Mithilesh Rai ‘ Mahadev ‘

Muktak :

दर्द के दामन में चाहत के कमल खिलते हैं!
अश्क की लकीर पर यादों के कदम चलते हैं!
रेंगते ख्यालों में नजर आती हैं मंजिलें,
जब भी निगाहों में ख्वाबों के दिये जलते हैं!


Muktak :

तेरी याद से खुद को आजाद करूँ कैसे?
तेरी चाहत में खुद को बरबाद करूँ कैसे?
लब्ज भी खामोश हैं बेबसी की राहों में,
तेरी मैं तकदीर से फरियाद करूँ कैसे?


Muktak :

मेरी जिन्दगी गमें-ख्याल बन गयी है!
तन्हा बेखुदी की मिसाल बन गयी है!
मेरे दर्द की कभी होती नहीं सहर,
रात जुदाई में बेहाल बन गयी है!


Muktak :

तुम मेरी यादों में आते किसलिए हो?
तुम मेरे दर्द को बुलाते किसलिए हो?
वक्त की दीवारों में दफ्न हूँ कबसे,
तुम मेरी रूह को रुलाते किसलिए हो?


Muktak :

दर्द तेरा कायम है याद भी आ जाती है!
#शाम_ए_तन्हाई में बेइन्तहाँ सताती है!
हंसने की जब भी तमन्ना होती है दिल में,
ख्वाबों की चुभन से मेरी आँख भर आती है!


Muktak :

जब भी ख्यालों में यादों की लहर आती है!
#दर्द की बेचैनी में रात गुजर जाती है!
अश्कों में घुल जाता है ख्वाबों का आशियाँ,
मेरी जिन्दगी को तन्हाई तड़पाती है!


Muktak :

मेरा ख्याल तेरी यादों से डर जाता है!
मेरे दर्द को दिल में गहरा कर जाता है!
जब भी करीब आती हैं बारिशों की बूँदें,
मौसम चाहतों का अश्कों से भर जाता है!


Muktak :

तुम मेरी चाहतों में हरवक्त बेशुमार हो!
तुम मेरी धड़कनों में आ जाते हर बार हो!
अब मुश्किल बहुत है रोकना तेरे सुरूर को,
तुम मेरी निगाहों में ठहरा हुआ खुमार हो!


Muktak :

मेरी नजर के सामने साकी रहने दो!
हाथों में अभी जाम को बाकी रहने दो!
धधक रही हैं तस्वीरें यादों की दिल में,
अश्कों में अभी दर्द की झांकी रहने दो!


Muktak :

तेरी दिल में ख्वाहिश आ ही जाती है!
जख्मों की फरमाइश आ ही जाती है!
आवाज गूँजती है जब भी यादों की,
हर ख्वाब की नुमाइश आ ही जाती है!


Muktak :

हर शाम चाहतों की आहट सी होती है!
हर शाम जिगर में घबराहट सी होती है!
जब रंग तड़पाता है तेरी अदाओं का,
मेरी साँसों में गर्माहट सी होती है!


Muktak :

हर शख्स निगाहों में प्यार लिए रहता है!
हर वक्त जेहन में खुमार लिए रहता है!
जब कभी रुक जाती है राह मंजिलों की,
दर्द का जिगर में बाजार लिए रहता है!


Muktak :

जब भी यादों की तस्वीर नजर आती है!
तेरे ख्यालों की जागीर नजर आती है!
मैं जब भी ढूँढता हूँ जिन्दगी की राहें,
तेरी बाँहों में तकदीर नजर आती है!


Muktak :

मुझको तेरी जुदाई मार डालेगी!
मुझको गमे-तन्हाई मार डालेगी!
कबतलक जी पाऊँगा तन्हा इसतरह?
मुझको गमे-रुसवाई मार डालेगी!


Muktak :

तेरे लिए मैं तन्हा होता जा रहा हूँ!
तेरे लिए मैं खुद को खोता जा रहा हूँ!
अश्कों में मिल गयी हैं यादों की लहरें,
तेरे लिए मैं तन्हा रोता जा रहा हूँ!


Muktak :

कभी कभी मैं खुद से पराया हो जाता हूँ!
दर्द की दीवार का एक साया हो जाता हूँ!
जब बेखुदी के दौर से घिर जाता हूँ कभी,
नाकाम हसरतों का हमसाया हो जाता हूँ!


Muktak :

कबतक जी सकूँगा नाकाम होते होते?
कबतक जी सकूँगा गुमनाम होते होते?
भटक रहा हूँ तन्हा मंजिल की तलाश में,
कबतक जी सकूँगा बदनाम होते होते?


Muktak :

कैसे कहूँ कि अब तुमसे प्यार नहीं रहा!
कैसे कहूँ कि तेरा इंतजार नहीं रहा!
हरपल करीब होती है तेरी जुस्तजू,
कैसे कहूँ कि तेरा तलबगार नहीं रहा!


Muktak :

मैं यादों का कभी कभी जमाना ढूँढता हूँ!
मैं ख्वाबों का कभी कभी तराना ढूँढता हूँ!
जब खींच लेती है मुझको राह तन्हाई की,
मैं अश्कों का कभी कभी बहाना ढूँढता हूँ!


Muktak :

तेरे हुस्न का मैं अफसाना लिए रहता हूँ!
तेरे प्यार का मैं नजराना लिए रहता हूँ!
मैं रोक नहीं पाता हूँ यादों का कारवाँ,
तेरे दर्द का मैं गमखाना लिए रहता हूँ!


Muktak :

मैं दफ्न उजालों का डूबा हुआ शहर हूँ!
मैं वक्ते-तन्हाई में यादों का सफर हूँ!
ढूँढता हूँ खुद को खौफ के अंधेरों में,
मैं ख्वाहिशों की राह में बेखुदी का डर हूँ!


Muktak :

कबतलक तेरा इंतजार मैं करूँ?
दर्द की नुमाइश हर बार मैं करूँ?
खौफ है कायम बेरुखी का तेरी,
कबतलक खुद को बेकरार मैं करूँ?


Muktak :

जब तेरी नजरों से मुलाकात होती है!
चाहत की दिल से रूबरू बात होती है!
यादों का तूफान कभी रुकता नहीं मगर,
तन्हाइयों के आलम में रात होती है!


Muktak :

जी रहा हूँ तुमको पाने की आस लिए!
जी रहा हूँ साँसों में तेरी प्यास लिए!
ख्वाब बंध गये हैं नजरों की डोर से,
प्यार के रंगों में तेरा एहसास लिए!


Muktak :

मेरी जिन्दगी की तस्वीर बन गये हो तुम!
मेरी मंजिलों की तकदीर बन गये हो तुम!
तूफान चल रहे हैं यादों के शामों-सहर,
दिल में चाहतों की जागीर बन गये हो तुम!


Muktak :

सूरज को रोशनी का गुमान किसलिए है?
शाम तन्हाई की पहचान किसलिए है?
टूटते नजारे हैं फिजा में हरतरफ,
रात आहटों की मेहमान किसलिए है?


Muktak :

टूट रहा हूँ मैं गमे-अंजाम सोचकर!
टूट रहा हूँ मैं गमे-नाकाम सोचकर!
मंजिल डरी हुई है दर्द-ए-बेरुखी से,
तेरी बेवफाई का पैगाम सोचकर!


Muktak :

जिन्दगी में तेरी हरपल कमी रहती है!
अश्क की आँखों में हरपल नमी रहती है!
दौर भी है कायम तेरी तमन्नाओं का,
दर्द की ख्यालों में हरपल जमीं रहती है!


Muktak :

हरबार तुम एक ही नादानी न करो!
हर किसी से जिक्र तुम कहानी न करो!
रूठी हुई है मंजिल प्यार की मगर,
हरबार तुम खुद की कुर्बानी न करो!


Muktak :

तेरा ख्याल जब भी बार-बार आता है!
दिल में बेचैनी का किरदार आता है!
बेताब नजर से लिपट जाती हैं यादें,
तेरी गुफ्तगूं का इंतजार आता है!


Muktak :

अपनी यादों को मिटाना आसान नहीं है!
अपने गम को भूल जाना आसान नहीं है!
तन्हाइयों की राह पर जब चलते हैं कदम,
सफर से लौट कर आना आसान नहीं है!


Muktak :

मुझको फिर भूली हुई बात याद आयी है!
चाहत की सुलगी हुई रात याद आयी है!
मैं मुन्तजिर हूँ आज भी दीदार का तेरे,
मुझको फिर तेरी मुलाकात याद आयी है!


Muktak :

जो साथ नहीं देते वे रूठ जाते हैं!
रास्तों में अक्सर हमसे छूट जाते हैं!
दूरियाँ बन जाती हैं दिलों के दरमियाँ,
हौसले भी जिन्दगी के टूट जाते हैं!


Muktak :

मैं भूला था कभी तेरे लिए जमाने को!
मैं भूला था कभी अपने आशियाने को!
भटक रहा हूँ जबसे गम के सन्नाटों में,
हर शाम ढूँढता हूँ जामे-पैमाने को!


Muktak :

तेरी चाहत मेरे गुनाह जैसी है!
तेरी चाहत दर्द की आह जैसी है!
आँखों में आहट है ख्वाबों की लेकिन,
तेरी चाहत सितम की राह जैसी है!


Muktak :

तेरा ख्याल जख्म के रंगों से भर गया है!
रूठे हुए नसीब की आहट से डर गया है!
यादों की जंजीर से जकड़ी है जिन्द़गी,
चाहत की जुत्सजू से तन्हा मुकर गया है!


Muktak :

उठती हुई नजर में एक आशा भी होती है!
मंजिल को छूने की अभिलाषा भी होती है!
रोशनी मौजूद है अभी जिन्दगी में लेकिन,
जज्बों के टूटने की परिभाषा भी होती है!


Muktak :

मेरी कोशिश तुमको पाने की है!
अपने करीब तुमको लाने की है!
कबतक सह पाऊँगा बेताबी को?
तेरी हर अदा तो सताने की है!


Muktak :

उठती नजर में तेरा चेहरा नजर आता है!
मुझपर तेरे प्यार का पहरा नजर आता है!
ख्वाबों के दायरे में ठहर जाती है जिन्दगी,
ख्वाहिशों का हर आलम गहरा नजर आता है!


Muktak :

कैसे कहूँ कि तेरा दीवाना नहीं हूँ मैं!
कैसे कहूँ कि तेरा परवाना नहीं हूँ मैं!
जब छलक रही है मदहोशी तेरे हुस्न से,
कैसे कहूँ कि आशिके-पैमाना नहीं हूँ मैं!


Muktak :

क्या हुआ अगर मैं खामोश हो गया हूँ!
जाम के नशे में मदहोश हो गया हूँ!
भटके हुए पलों में खोया हूँ इसतरह,
महफिलों में खानाबदोश हो गया हूँ!


Muktak :

बंद हैं आँखें मगर कुछ बोलती रहती हैं!
राह तमन्नाओं की कुछ खोलती रहती हैं!
जिन्दा है तेरी आरजू मेरे जेहन में,
दर्द की लहरें जिगर में डोलती रहती हैं!


Muktak :

जब जिन्दगी में आलम वीरान मिल जाते हैं!
भटकी हुई तमन्ना के निशान मिल जाते हैं!
भीगी हुई सी तन्हाई में चलते हैं कदम,
बिखरे हुए इरादों के तूफान मिल जाते हैं!


Muktak :

किस किस को मैं अपनी नादानी को कहूँ?
किस किस को मैं दर्द की रवानी को कहूँ?
जले हुए से ख्वाब हैं अश्कों में तैरते,
किस किस को मैं प्यार की कहानी को कहूँ?


Muktak :

तेरी सूरत का मैं दीवाना हूँ कबसे!
तेरी बेताबी का परवाना हूँ कबसे!
अंजामे-बेरूखी से बिखरी है जिन्दगी,
जख्मे-तन्हाई का अफसाना हूँ कबसे!


Muktak :

मेरी बेखुदी को कोई नाम न देना!
मेरी तमन्नाओं को इल्जाम न देना!
बहके हुए इरादों को तड़पाना न कभी,
सुलगी हुई तन्हाई की शाम न देना!


Muktak :

तेरी यादों के कदम रुक नहीं पाते!
तेरी जुल्फों के सितम रुक नहीं पाते!
रोशनी उम्मीद की रहेगी कबतलक?
तेरी चाहत के वहम रुक नहीं पाते!


Muktak :

कभी तो तेरे लब पर मेरा नाम आएगा!
कभी तो मेरी चाहत का पैगाम आएगा!
खींच लेगी तुमको कभी यादों की खूशबू,
कभी तो तेरी नजरों का सलाम आएगा


Muktak :

कबसे तड़प रहा हूँ तुमको याद करते करते!
कबसे तड़प रहा हूँ मैं फरियाद करते करते!
बैठा हुआ हूँ मुद्दत से तेरे इंतजार में,
कबसे जिन्द़गी को मैं बरबाद करते करते!


Muktak :

खामोश नजरों के नजारे बोलते हैं!
खामोश लहरों के किनारे बोलते हैं!
मुश्किल है कह देना लबों से चाहत को,
खामोश कदमों के इशारे बोलते हैं!


Muktak :

तुझको देखना मुझको सुकून देता है!
तुझको सोचना मुझको जुनून देता है!
जिन्दा है अभी नजरों में ख्वाब का शजर,
तुझको चाहना मुझको मजमून देता है!

Muktak :

तेरे लिए मैं अपना ठिकाना भूल जाता हूँ!
तेरे लिए मैं अपना जमाना भूल जाता हूँ!
मदहोश हो चुका हूँ तेरी चाहत में इतना,
तेरे लिए जाम का पैमाना भूल जाता हूँ!


Muktak :

तेरे बिना छायी हुई हरतरफ उदासी है!
तेरे बिना अब भी मेरी जिन्दगी प्यासी है!
उम्र थक रही है मेरी मंजिल की तलाश में,
तेरे बिना ठहरी हुयी हर खुशी जरा सी है!


Muktak :

आज भी मुझे तेरी कमी महसूस होती है!
ख्वाबों की पलकों में नमी महसूस होती है!
रूठी हुई है मंजिल भी तकदीर से मेरी,
दर्द की कदमों तले जमीं महसूस होती है!


Muktak :

बिखर गये हैं ख्वाब मगर यादें रह गयी हैं!
जिन्दगी में दर्द की फरियादें रह गयी हैं!
साँसें भी थक गयी हैं तेरे इंतजार में,
तेरी तमन्नाओं की मुरादें रह गयी हैं!


Muktak :

कभी न कभी हमारा ख्वाब बदल जाता है!
रूठे हुए पलों का जवाब बदल जाता है!
जज्बों की आजमाइशें होंगी कभी न कम,
दर्दे-जिन्दगी का आदाब बदल जाता है!


Muktak :

तेरा नाम लेकर तन्हाई मिल जाती है!
तेरा दर्द बनकर रुसवाई मिल जाती है!
शामों-सहर भटकता हूँ मैं तेरे लिए मगर,
मेरी जिन्द़गी को जुदाई मिल जाती है!


Muktak :

कौन है वो शक्स जो हमारा बनेगा?
बेबसी के दौर में सहारा बनेगा!
बुझ न जाए तन्हा चिराग जिन्द़गी का,
डूबते इरादों का किनारा बनेगा!


Muktak :

तेरे लिए हरपल बेकरार सा रहता हूँ!
तेरे लिए हरपल तलबगार सा रहता हूँ!
गुफ्तगूँ की चाहत भी जिन्दा है लेकिन,
तेरी बेरुखी से लाचार सा रहता हूँ!


Muktak :

मेरी जिन्दगी से यादों को तुम ले लो!
मेरे दर्द की फरियादों को तुम ले लो!
हर घड़ी रुलाती हैं अब तेरी ख्वाहिशें,
मेरे ख्यालों से इरादों को तुम ले लो!


Muktak :

तेरी आरजू ने यही काम किया है!
मेरी जिन्द़गी को बदनाम किया है!
कैसे मैं छुपाऊँ अंजाम को सबसे?
दर्द ने नुमाइश तेरे नाम किया है!


Muktak :

तुमको मैं जबसे खुदा मान बैठा हूँ!
जिन्द़गी को गुमशुदा मान बैठा हूँ!
खोजती हैं महफिलें जमाने की मगर,
खुद को मैं सबसे जुदा मान बैठा हूँ!


Muktak :

मेरे दर्द का आलम गुजर गया है!
तेरी बेरुखी का जख्म भर गया है!
कोई नहीं है मंजिल न राह कोई,
चाहतों का हर मंजर बिखर गया है!

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