#Muktak by Annang Pal Singh

पण्डित वा ग्यानी वही खुद को ले जो जान !
अन्तः चेतन भाव ही आत्मरूप पहचान !!
आत्मरूप पहचान जान ले जो अपने को !
वह भविष्य ग्याता , देखे भावी सपने को !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,आत्मा होय न खण्डित !
जो खुद को ले जान , वही कहलाये पण्डित. !!

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आत्म साधना करो नित , नश्वर है यह देह. !
पाना है अमरत्व तो बनकर रहो विदेह. !!
बनकर रहो विदेह , करो पूजा जीवन की !
ढ़ूँढ़ो अपने अंदर , धारा अपने पन. की !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,यही सच्ची उपासना !
पल भर में ही सुखी बना दे आत्म साधना !!
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मत ढ़ूँढ़ो बाहर जगत , सच्चे सुख का स्रोत !
सच्चे सुख का स्रोत तो अपने अंदर. होत !!
अपने अंदर होत , वही आनंद प्रदायक. !
बाह्य जगत में कहीं नहीं सुख अपने लायक!!

कह ंअनंग ंकरजोरि, बढ़ाओ अंदर चाहत !

बाहर आभासी सुख हैं, इनमें उलझो मत. !!

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लड़ना है तो आत्मा से लो युद्ध रचाय !
जीत गये तो ठीक है हारे हार न आय. !!
हारे हार न आय, आत्मा मालिक घर की !
मन की उल्टी चाल कामना दुनियाँ भर की !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,आत्मबल सँग नित बढ़ना !
बाहर करो न युद्ध सदा अंदर ही लड़ना !!

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जैसे मन की कामना , तन वासना प्रधान !
आत्मतत्व आवाज है ,अंतःकरण महान. !!
अंतःकरण महान , सदा सुन इसकी प्यारे !
आत्मतत्व के इसी रूप में दिखें नजारे !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,आत्मा जानो एसे !
पुष्प प्रफुल्लित होकर , खुशबू देता जैसे !!
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जाग्रत करिये हृदय में , आत्मरूप का मान !
तत्पश्चात विचार कर , करिये कर्म जहान. !!
करिये कर्म जहान , आत्मा जो करवाये !
वही करो वा सुनो उसीकी , भ्रम ना आये !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,हृदय उपजाओ सतव्रत !
आत्म सनेही दीप, हृदय में रखिये जाग्रत. !!

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