#Muktak by Annang Pal Singh

घण्टा जिसने  एक भी , किया  व्यर्थ  बरवाद ।

समझो कीमत जिन्दगी की नहिं उसको याद ।।

की नहिं उसको याद , व्यर्थ जीवन दिन काटे ।

भूल  मुख्य  उद्देश्य ,  करे  नित  सैर  सपाटे ।।

कह “अनंग”करजोरि , यही माया का अण्टा ।

भूल गया जो लक्ष्य  , भटक काटे हर घण्टा ।।

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धोखा देते सभीको , दे विषय़ुत मुस्कान  ।

दिखे प्रतिष्ठा बाहरी ,भीतर पतित जहान ।।

भीतर पतित जहान  ,और के कंधे  तोड़े  ।

अपना काम निकाल , वीच रस्ते में छोड़े ।।

कह”अमंग”करजोरि,दिखे धंधा यह चोखा।

दे विषयुत मुस्कान , सभी को  देते धोखा ।।

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बस भीतरी पवित्रता , ही है सुख की डोर  ।

बाहर तृष्णा गन्दगी , दिखती  चारों ओर ।।

दिखती चारों ओर,करे मन को नित दूषित ।

आकर्षण दिखलाय,करे तन मन को भूषित।।

कह” अनंग”करजोरि,करे यह हमको बेवश ।

यदि चाहो सुख शांति,रखो शुचिता भीतर बस।।

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सोना निखरे तभी जब , सहे आग का ताप ।

यही हाल इंसान का , समझो प्रियवर आप ।।

समझो प्रियवर आप , चमक पड़ जाती फीकी ।

मैली -गन्दी चीज , नहीं  लगती  है  नीकी ।।

कह “अनंग”करजोरि, साफरख अंतस् कोना ।

पड़े तपाना खूब , निखरता तब ही  सोना ।।

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शुचिता यदि अंदर भरी , बाहर दिखे प्रसन्न ।

मटमैलापन आंतरिक , करदे  शीघ्र विपन्न ।।

करदे शीघ्र विपन्न , ऊब में बदले सुख  को ।

चरित और व्यक्तित्व,दूर करता है दुख को ।।

कह “अनंग”करजोरि, वहीं सच्ची मानवता ।

जहाँ सँभारी जाय, नित्य अंदर की शुचिता ।।

अनंग पाल सिंह भदौरिया” अनंग”

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