#Muktak by Annang Pal Singh

आशा,आशंका तथा, शक, विश्वास स्वभाव  ।

क्या भविष्य है जानना, रहता  मानव  भाव  ।।

रहता  मानव  भाव , भरे  उत्सुकता  मन  में  ।

काल गर्भ में छुपा , हुआ क्या  है  जीवन  में ।।

कह “अनंग”करजोरि , शत्रु है बड़ी,  निराशा  ।

लीजै हृदय बसाय , बड़ा  सम्बल  है  आशा  ।।

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घूमो अंतरजगत में , पढ़ो  किताब बनाय  ।

वर्तमान के साथ ही , लेउ भविष्य सजाय ।।

लेउ भविष्य सजाय ,बाँसुरी सम हो जाओ ।

परमेश्वर की फूँक , देय स्वर  उसे बजाओ ।।

कह “अनंग”करजोरि,स्वच्छकर अंतर चूमो ।

अंतरात्मा  ईश  ,  संग  उसके  नित  घूमो ।।

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ऊपर जो ले जा लके , तुमको अपने साथ ।

उन लोगों से राखिये , सदा मिलाकर हाथ ।।

सदा मिलाकर हाथ , सदाचारी बन रहिये  ।

शांति सहजता नीर,सरित में नित नित बहिये ।।

कह “अनंग”करजोरि,बहुत ऐसे जन भू पर ।

प्रेम करें नि:स्वार्थ , और ले  जाते  ऊपर  ।।

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जीवन में होने लगे , जब दुख की वरषात  ।

तो छतरी सत्संग की , लगा लीजिये भ्रात ।।

लगा लीजिये भ्रात ,दुखों से होउ न आहत ।

वरषाती  स्वाध्याय  , खूब  देती  है  राहत ।।

कह”अनंग”करजोरि,ज्ञान महिमा जानो मन।

इससे कुछ नहिं श्रेष्ठ,करे जो उन्नत जीवन ।।

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ऐसे ढ़ूढ़ो सुधारक , खुद को लेंय सुधार ।
जो सुधारते और को , उन्हॆं न पकड़ो यार ।।
उन्हें न पकड़ो यार , लखें औरों में अवगुण ।
उनपर करो विचार,भरे जिनके उर सदगुण ।।
कह”अनंग”करजोरि , देख जन बनते वैसे ।
स्वयं करें बदलाव , ढूँढ़िये सज्जन ऐसे ।।

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अपने दुर्गुण जानकर व्यक्ति बने आवाद ।
दोषों से अनभिज्ञता , सबसे बड़ा प्रमाद ।।
सबसे बड़ा प्रमाद , दोष अपने पहचानो ।
उनमें करो सुधार , श्रेष्ठता समझो जानो ।।
कह “अनंग”करजोरि,देखिये उत्तम सपने ।
बाहर करो निकारि,छुपे जो दुर्गुण अपने ।।
अनंग पाल सिंह “अनंग”

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