#Muktak by Annang Pal Singh

मानव जीवन लक्छ्य यह , ले खुद को पहचान. !
सेवा कर हर जीव की , यह इस हेतु विधान. !!
यह इस हेतु विधान , ध्यान परमेश्वर का कर. !
अहंकार को जीव मात्र की सेवा से हर !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,सभी से हो अपनापन. !
तभी सफल होगा , समझो यह मानव जीवन !!

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मर्यादा कर्तव्य को झुठलाना ना मुक्ति !
वरन् छुद्रता , दुष्टता,छुटकारे की युक्ति !!
छुटकारे की युक्ति ,चेतना दीप जलाओ !
सीमा से उपरत होकर ,असीम हो जाओ!!
कह ंअनंग ंकरजोरि,करो अपने से वादा !
कर्त्तव्यों के पथ चलकर साधो मर्यादित !!

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अंतरात्मा कभी भी , जल से साफ न होय !
आत्म नदी स्नान कर , इसको लीजै धोय. !!
इसको लीजै धोय , पुण्य. भागी बन जाओ !
संयम ही है तीर्थ , सत्व जल कूद नहाओ !!
कह ंअनंग ंकरजोरि,शील तट नदी आत्मा !
दयापूर्ण. व्यवहार , लहर. है अंतरात्मा !!

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धर्म आत्मा वही जो , दर्शन , ग्यान सँयुक्त !
और सभी संयोग तो , बाह्य भाव से युक्त !!
बाह्य भाव से युक्त , आत्मा सिद्धि प्रदाता !
ग्यान , आत्मा का हमको,अमरत्व सिखाता!!
कह ंअनंग ंकरजोरि,मरे ना कभी आत्मा !
दर्शन , ग्यान सँयुक्त , कहाती धर्म. आत्मा !!

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