#Muktak By Annang Pal Singh

दीपक जले सनेह से , बाती का गुणगान  !

मंदिर फलदाता नहीं , फल दे अंतरज्ञान !!

फल दे अंतरज्ञान , नहीं बाहर फलदाता  !

उपजाओ सद्ज्ञान , उसीमें दिखे विधाता !!

कह”अनंग “करजोरि,देखिये अंदर अपलक!

जला रहा है कौन ?जनम से अबतक दीपक!!

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पावनता  वा  स्वच्छता  ,  अपने  हृदय  बसाउ  !

स्वच्छ वस्त्र,तनस्वच्छ हो,फिर मन स्वच्छ बनाउ !!

फिर मन स्वच्छ बनाउ , चरित हो सुन्दर पावन  !

सब प्रकार सुन्दर ,  शुचितम रखिये मन आँगन !!

कह “अनंग “करजोरि  ,  यही मानव  मानवता  !

भरी  रहे  मनमाहिं   ,  सदा  सुखमय  पावनता !!

 

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अंतरमन को साफ कर , दीपक वहाँ जलाउ. !

शुचिता,करुणा,दया का,शुभ प्रकाश फैलाउ !!

शुभ प्रकाश फैलाउ , जलालो अंतर  दीपक  !

परमेश्वर का  पाथ ,   यहीं  से  गुजरे  बेशक !!

कह “अनंग “करजोरि,भरो दीपक अपनापन  !

जलता रहे अखण्ड , उजाला  हो  अंतर मन !!

अनंग पाल सिंह भदौरिया “अनंग”

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