#Muktak By Annang Pal Singh

प्रेम शील सराबोर , प्रेमी प्रिय होवे पर ,
प्रेम के सिवाय कौन , ईश्वर को जानता !
प्रेमबिना सूख जाय , जीवन का क्षण क्षण,
निर्मम हृदय कोष , शोषण समानता !!
करकश कठोरता , कटुता कुकर्म कोख ,
यही है स्वरूप जिसे , जग पहचानता !
पोषण हो स्वारथ का,जहाँ वहाँ कहाँ शील,
बिना प्रेम दिल की ना, कोई महानता !!

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लोग स्वार्थ हित गढ़ रहे , राजनीति परिवेश  !
इसीलिये विश्वास अब , नहीं  रह  गया  शेष !!
नहीं रह गया शेष , कहीं  विश्वास  किसीका  !
कूटनीति  या  राजनीति   , है  नाम  इसीका !!
कह “अनंग “करजोरि , बदलते हैं रिश्ते नित  !
बदल रहा परिवेश , बढ़ रहे  लोग स्वार्थ हित !!

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रिश्ते- नाते, द्वार- घर  , ना  सूझे  पहचान  !

सेलफोन इतना अहम,लगा रहे नित कान !!

लगा रहे नित कान,फोन की बड़ी अहमियत !

कहलाये सच-झूठ,समझ ना पड़े असलियत !!

कह “अनंग “करजोरि,सत्य अब हम बतलाते !

सेलफोन  है  प्रथम  ,  बाद  में  रिश्ते – नाते !!

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