#Muktak by Annang Pal Singh

अवगुण ऐसे जानिये , ज्यों नौका में छेद  ।

नाव डूब जाती तथा , जान न पाते  भेद ।।

जान न पाते भेद ,  डुबाते  जीवन नैय्या  ।

आस्तीन के साँप,सदृश हैं अवगुण भैय्या ।।

कह”अनंग”करजोरि,बिठाओ अंदर सद्गुण ।

जैसे खाये अन्न,कीट घुन, तन मन अवगुन ।।

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अनुभव लाखों लिखे हैं , झुर्री भऱे शरीर  ।

उनसे सीखो प्रेम से,कुछ अनुभव गंभीर ।।

कुछ अनुभव गंभीर ,हृदय अपने बैठारो  ।

की ज्यों साज सँभार,तुम्हारी उन्हें सँभारो ।।

कह”अनंग”करजोरि, बनोगे उन्नत मानव  ।

यदि उर लिये बसाय,बुजुर्गों के कुछ अनुभव ।।

अनंग पाल सिंह भदौरिया”अनंग”

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