#Muktak by Annang Pal Singh

एकाकीपन दूर यदि , करना जीवन माहिं ।
तो मन तक पहुँचाउ मन, और तरीका नाहिं ।।
और तरीका नाहिं , मनहि मन को समझावे ।
मन ही मन का साथ, देय मन को दुलरावे ।।
कह”अनंग”करजोरि,रीति यह सही सदा की ।
मन मन से मिल जाय,रहे नहिं फिर एकाकी ।।

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पहले सोचें फिर कहें , बुद्धिमान वह लोग ।
कहकर पछताते नहीं , यहअति श्रेष्ठ प्रयोग ।।
यह अति श्रेष्ठ प्रयोग,सोचकर कहो बात को ।
जड़ तक लेउ निहार,न देखो सिर्फ पात को ।।
कह”अनंग”करजोरि,उचित हो जो वह कहले ।
हितकारी सब भाँति , सोच कहने से पहले ।।

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भीतर अगर कुरूपता , बाहर करो निकार  ।

बाह्यरूप मत  देखिये , दर्पण  के  दरवार  ।।

दर्पण के  दरबार , रूप  दिखता  आभासी  ।

नहीं गुणों की झलक,तुम्हें दिखलाय जरासी ।।

कह” अनंग”करजोरि, निकालो दुर्गुण तीतर  ।

सदाचार,सदभाव , औऱ सद गुण भर भीतर ।।

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चित निर्मलता दृष्टि को , भदक देय बनाय  ।

यहां देखते सभी हैं  , पर देखना  न  आय ।।

पर देखना न आय , बहुत मैला मन दर्पण  ।

होता मन तब साफ,होय जब पूर्ण समर्पण ।।

कह”अनंग”करजोरि,रगड़िये इसको नित नित ।

भेदक देय बनाय ,दृष्टि को शुचि निर्मल चित ।।

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रेखायें अनुभव भरीं , हैं वृद्धों के माथ  ।

उन्हें निहारो प्रेम से , रहकर उनके साथ ।।

रहकर उनकेसाथ,जानिये उनके अनुभव ।

तुमको देंय बनाय , सही अर्थों में मानव ।।

कह “अनंग”करजोरि,लौट वह फिर नहिं आयें ।

हैं जीवन का सार , झुर्रियों  की  रेखायें  ।।

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