#Muktak by Annang Pal Singh

सब सुख बाँटे यहीं पर, वह भवसर तरि जाय  ।

भार न लो  संसार का  , भवसर  देय  डुबाय  ।।

भवसर देय डुबाय , भार जग  का मत  धरिये  ।

कर खुद को निर्भार , यात्रा सुख मय  करिये  ।।

कह” अनंग”करजोरि, बात यह समझोगे कब  ।

इस जग से ही लिया , यहीं पर बाँट देउ  सब  ।।

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मैं, मेरा,मेरे लिये ,इस तन का सम्बंध  ।

लेना लेना सिखाता ,देने पर प्रतिबंध ।।

देने पर प्रतिबंध,बड़ी उलझन भौतिकता ।

रहे खड़ी असहाय ,इकतरफ सबभौतिकता ।।

कह “अनंग”करजोरि, तंग माया का घेरा ।

सबको रहा सिखाय, श्रेष्ठ जग में मैं ,मेरा ।।

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सुख देने के भाव से , बहे सुसत्य प्रवाह  ।

हो अशुद्ध अंत:करण ,सुख लेने की चाह ।।

सुख लेने की चाह,किसी को दुख पहुँचाये ।

अगर दुखी जन कोय,तुम्हें सुख कैसे आये ।।

कह “अनंग”करजोरि,मिटाओ औरों के दुख ।

अंतरात्मा सुखी , तभी होगा  सच्चा  सुख  ।।

अनंगपाल सिंह भदौरिया “अनंग”

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