#Muktak by Ajeet Singh Avdan

दोहे

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सपनो के संसार की, बातों में क्या खाश ।

पाया खोते पल रही,है साँसों में आश ।।

चित्त द्वार संसय खड़ा, सिरजत सृजन विकल्प ।

मध्य आदि से अन्त के, शेष समय अति अल्प ।।

मिला पड़ा नव चाह में, जो नित मिली नवीन ।

सद्-उपयोगी हो रहा, व्यर्थ अकारण हीन ।।

अवधि अधिक या न्यून में, गर्व प्रसार अनन्त ।

अल्प काल में कल्प के,  ज्ञान ध्यान का अन्त ।।

स्वाभिमान की खोल में, पोषित रहा घमण्ड ।

ढ़ला मान अभिमान का, खण्डन हुआ अखण्ड ।।

विगत भ्रमित मन बावरा, अगत सूझ मतिमन्द ।

क्यों कर बूड़ा ऊबरे, अक्षय द्वेषता चन्द ।।

पथिक अगम पथ के तनिक, यूँ भी सोच विचार ।

श्रोत आज निज सार का, घटत काल अनुसार ।।

कल-कल में चलती रही, जब जीवन की नाव ।

कल बीजे उन बीज की, आज विकलता छाँव ।।

प्रेम शुलभ अवदान पर, पहल जगत की रीत ।

कटुता पाले कब मिली, बैर मिटाती प्रीत ।।

…अवदान शिवगढ़ी

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