#Muktak by Chandrakanta Siwal

मुक्तक माणिक

*******

ऊँची- ऊँची कुर्सी की फैली बड़ी बिमारी है।

गधे सियारों संग में वाचालों की अय्यारी है।।

इसका झूठ उसका सच एक ख्याल सबका,

मन्त्र मुग्ध सब आपस में ये कैसी लाचारी है।

*************

मन से पढ़ती मन की बात हूक प्रेम की भाषा है।।

आँख आँख में करती बात मूक प्रेम की भाषा है।

प्रेम ही केवल एक विकल्प हर मर्ज़ की दवा

दिल पे घाव लगे जब फूक प्रेम की भाषा है।

************

एक आप ही नहीं हैं ज़ख्म खाये हुए।

एक हम भी हैं जमाने के सताये हुए।।

खायी थी कसम उसने कभी न मिलने की,

फिर आज क्यूँ  है तस्सवुर में वो आये हुए।

** चंद्रेश **

87 Total Views 3 Views Today
Share This

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *