muktak by Devanshu maurya

वक्त ने  वक्त पर  इस कदर मजबूर  कर दिया,
गुरूर  तो था  बहोत  सब  चूर-चूर  कर  दिया,
क्या पता कब  पासा पलट जाये ज़िन्दगी का,
जो  ख़ुद दरिया  था उसे भी  प्यासा कर दिया.

One thought on “muktak by Devanshu maurya

  • December 26, 2015 at 2:49 pm
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    बहुत सुंदर पंक्तियाँ वाह देवाशुं।

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