#Muktak by dr. gopal rajgopal

सटे हुए दो प्लोट के,मालिक पक्के यार ।
दोनों के है बीच में ,शामिल की दीवार ।।

नहीं चाहिये पल मुझे,जो करते विध्वंस ।
सदियों में बहता रहे,इस जीवन का अंश ।।

होती अक्सर चोरियां,थाने ही के पास ।
सुनते आये दीप के,पैंदे तम का वास ।।

बिन दीक्षा के दक्षिणा, कुछ तो बोलो द्रोण ।
अर्जुन या कि एकलव्य,गुरुभक्त है कौन ।।

मरे हुए को मारने,में भी है इक शान ।
खंजर लेकर आ गये,वो सीधे शमशान ।।

One thought on “#Muktak by dr. gopal rajgopal

  • January 8, 2016 at 1:35 pm
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    आभार नेगी साहब !

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