muktak by kavi anil uphar

खूब बरसी रहमते हर बार नफरत बो गया ।

और सियासी हाला पीकर उसके मद में खो गया ।

क्या इसे होना यहाँ था और यह क्या हो गया ।

तू देख तो मेरे खुदा इंसान कों क्या हो गया ।

Leave a Reply

Your email address will not be published.