#Muktak by Kavi Anil Uphar

आज धूमिल हर स्वप्न हो गया बापू तेरे देश का ।

शर्मसार है ज़र्रा ज़र्रा आधुनिक परिवेश का ।

मानवता की लाश लिए वो खुद कांधे पर निकल पड़ा

पूछ रहा है सवा अरब अंजाम सियासी ऐश का ।

अनिल उपहार ।।।।।

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