#Muktak by kumar prem

आज फिर नभ पे सावन की काली घटा छाई है।
फ़लक पे आज जैसे तेरी ज़ुल्फो की परछाई है।।
रिमझिम बरसती ये बूंदे याद दिलाती है तुम्हारी।।
जैसे हर बूँद गुज़र तेरी जुल्फों से आई है।।(कुमार प्रेम)

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