muktak by kunwar bharti

जिनसे हमें अपेक्षा जितनी, उससे संभावित उतना दर्द,
अंतरंगता रिश्तों की गहरी, हो उम्मीदों की जंग में सर्द;
भंवर आशा और निराशा का, सामान्य नहीं रहने देता,
जूझें हम निज अन्तर्द्वंदवोँ से, विजयी हों स्त्री औ मर्द ।

362 Total Views 3 Views Today
Share This

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *