muktak by kunwar bharti

मन प्रमथन स्वभाव का स्वामी, भटकन इसकी फ़ितरत है,
काम क्रोध मद लोभ हैं चुम्बक, योग ध्यान से अधोपतन है;
लक्ष्य जन्म का होता अदृश्य, कंचन कामिनि चहुँदिश देखे,
आत्म बोध अरु प्रज्ञा के पथ का तब तो हो जाता तर्पण है ।

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