#Muktak by ramesh raj

|| मुक्तक ||—-30.

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झाँकन के झंझावात, झरना न झील है

काया कुम्हलायी कहीं कंठ-कंल कील है।

नदी-नदी नीर न, न नारि नर नंद में

चपला-सी चाल चलै चाँद-चाँद चील है।

+रमेशराज

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